प्रस्तुत गद्यांश को पढ़िए और उचित विकल्पों का चयन | करके उत्तर दीजिये:
रास्ते पर खड़ा ये आम का पेड़, सदा से ठूंठ नहीं है। दिन थे जब वह हरा भरा था और उस जनसंकुल चौराहे पर । अपनी छतनार डालियों से बटोहियों की थकान अनजाने दूर करता था। पर मैंने उसे सदा ठूंठ ही देखा है। पत्रहीन, शाखाहीन, निरवलंब, जैसे पृथ्वी रूपी आकाश से सहसा निकलकर अधर में ही टंग गया हो। रात में वह काले भूत-सा लगता है, दिन में उसकी छाया इतनी गहरी नहीं हो पाती जितना काला उसका जिस्म है और अगर चितेरे। को छायाचित्र बनाना हो तो शायद उसका-सा 'अभिप्राय' और न मिलेगा। प्रचंड धूप में भी उसका सूखा शरीर उतनी ही गहरी छाया ज़मीन पर डालता जैसे रात की उजियारी चांदनी में जब से होश संभाला है, जब से आँख खोली है, देखने का अभ्यास किया है, तब से बराबर मुझे उसका निस्पंद, नीरस, अर्थहीन शरीर ही दिख पड़ा है।
पर पिछली पीढ़ी के जानकार कहते हैं कि एक जमाना था जब पीपल और बरगद भी उसके सामने शरमाते थे और उसके पत्तों से, उसकी टहनियों और डालों से टकराती हवा की सरसराहट दूर तक सुनाई पड़ती थी। पर आज वह नीरव है, उस चौराहे का जवाब जिस पर उत्तर- दक्षिण, पूरब पश्चिम चारों ओर की राहें मिलती हैं और जिनके सहारे जीवन अविरल बहता है। जिसने कभी जल को जीवन की संज्ञा दी, उसने निश्चय जाना होगा कि | प्राणवान जीवन भी जल की ही भांति विकल, अविरल बहता है । सो प्राणवान जीवन, मानव संस्कृति का उल्लास उपहार लिए उन चारों राहों की संधि पर मिलता था जिसके एक कोण में उस प्रवाह से मिल एकांत शुष्क आज वह ठूंठ खड़ा है। उसके अभाग्यों की परंपरा में संभवतः एक ही सुखद अपबाट है उसके अंश का
शाखाहीन, रसहीन, शुष्क वृक्ष को ठूंठ वृक्ष कहा गया है।
Key Points
- गद्यांश के अनुसार -
- रास्ते पर खड़ा ये आम का पेड़, सदा से ठूंठ नहीं है। दिन थे जब वह हरा भरा था और उस जनसंकुल चौराहे पर ।
- अपनी छतनार डालियों से बटोहियों की थकान अनजाने दूर करता था। पर मैंने उसे सदा ठूंठ ही देखा है।
- पत्रहीन, शाखाहीन, निरवलंब, जैसे पृथ्वी रूपी आकाश से सहसा निकलकर अधर में ही टंग गया हो।
Additional Informationअन्य विकल्प -
- नीरस वृक्ष - गद्यांश में तब से बराबर मुझे उसका निस्पंद, नीरस, अर्थहीन शरीर ही दिख पड़ा है।
- जड़ वृक्ष - गद्यांश में 'जड़ वृक्ष' की चर्चा कही भी नहीं की गयी है।
- हीन वृक्ष - गद्यांश में 'हीन वृक्ष' की चर्चा कही भी नहीं की गयी है।
प्रस्तुत गद्यांश को पढ़िए और उचित विकल्पों का चयन | करके उत्तर दीजिये:
रास्ते पर खड़ा ये आम का पेड़, सदा से ठूंठ नहीं है। दिन थे जब वह हरा भरा था और उस जनसंकुल चौराहे पर । अपनी छतनार डालियों से बटोहियों की थकान अनजाने दूर करता था। पर मैंने उसे सदा ठूंठ ही देखा है। पत्रहीन, शाखाहीन, निरवलंब, जैसे पृथ्वी रूपी आकाश से सहसा निकलकर अधर में ही टंग गया हो। रात में वह काले भूत-सा लगता है, दिन में उसकी छाया इतनी गहरी नहीं हो पाती जितना काला उसका जिस्म है और अगर चितेरे। को छायाचित्र बनाना हो तो शायद उसका-सा 'अभिप्राय' और न मिलेगा। प्रचंड धूप में भी उसका सूखा शरीर उतनी ही गहरी छाया ज़मीन पर डालता जैसे रात की उजियारी चांदनी में जब से होश संभाला है, जब से आँख खोली है, देखने का अभ्यास किया है, तब से बराबर मुझे उसका निस्पंद, नीरस, अर्थहीन शरीर ही दिख पड़ा है।
पर पिछली पीढ़ी के जानकार कहते हैं कि एक जमाना था जब पीपल और बरगद भी उसके सामने शरमाते थे और उसके पत्तों से, उसकी टहनियों और डालों से टकराती हवा की सरसराहट दूर तक सुनाई पड़ती थी। पर आज वह नीरव है, उस चौराहे का जवाब जिस पर उत्तर- दक्षिण, पूरब पश्चिम चारों ओर की राहें मिलती हैं और जिनके सहारे जीवन अविरल बहता है। जिसने कभी जल को जीवन की संज्ञा दी, उसने निश्चय जाना होगा कि | प्राणवान जीवन भी जल की ही भांति विकल, अविरल बहता है । सो प्राणवान जीवन, मानव संस्कृति का उल्लास उपहार लिए उन चारों राहों की संधि पर मिलता था जिसके एक कोण में उस प्रवाह से मिल एकांत शुष्क आज वह ठूंठ खड़ा है। उसके अभाग्यों की परंपरा में संभवतः एक ही सुखद अपबाट है उसके अंश का
आम के वृक्ष के सामने पीपल और बरगद के शरमाने का कारण नहीं है - पीपल और बरगद के सामने ही आम के पेड़ का ठूंठा हो जाना ।
Key Pointsगद्यांश के अनुसार -
- रास्ते पर खड़ा ये आम का पेड़, सदा से ठूंठ नहीं है। दिन थे जब वह हरा भरा था और उस जनसंकुल चौराहे पर।
- पर पिछली पीढ़ी के जानकार कहते हैं कि एक जमाना था जब पीपल और बरगद भी उसके सामने शरमाते थे
- और उसके पत्तों से, उसकी टहनियों और डालों से टकराती हवा की सरसराहट दूर तक सुनाई पड़ती थी।
- प्रचंड धूप में भी उसका सूखा शरीर उतनी ही गहरी छाया ज़मीन पर डालता जैसे रात की उजियारी चांदनी में जब से होश संभाला है,
- जब से आँख खोली है, देखने का अभ्यास किया है, तब से बराबर मुझे उसका निस्पंद, नीरस, अर्थहीन शरीर ही दिख पड़ा है।
प्रस्तुत गद्यांश को पढ़िए और उचित विकल्पों का चयन | करके उत्तर दीजिये:
रास्ते पर खड़ा ये आम का पेड़, सदा से ठूंठ नहीं है। दिन थे जब वह हरा भरा था और उस जनसंकुल चौराहे पर । अपनी छतनार डालियों से बटोहियों की थकान अनजाने दूर करता था। पर मैंने उसे सदा ठूंठ ही देखा है। पत्रहीन, शाखाहीन, निरवलंब, जैसे पृथ्वी रूपी आकाश से सहसा निकलकर अधर में ही टंग गया हो। रात में वह काले भूत-सा लगता है, दिन में उसकी छाया इतनी गहरी नहीं हो पाती जितना काला उसका जिस्म है और अगर चितेरे। को छायाचित्र बनाना हो तो शायद उसका-सा 'अभिप्राय' और न मिलेगा। प्रचंड धूप में भी उसका सूखा शरीर उतनी ही गहरी छाया ज़मीन पर डालता जैसे रात की उजियारी चांदनी में जब से होश संभाला है, जब से आँख खोली है, देखने का अभ्यास किया है, तब से बराबर मुझे उसका निस्पंद, नीरस, अर्थहीन शरीर ही दिख पड़ा है।
पर पिछली पीढ़ी के जानकार कहते हैं कि एक जमाना था जब पीपल और बरगद भी उसके सामने शरमाते थे और उसके पत्तों से, उसकी टहनियों और डालों से टकराती हवा की सरसराहट दूर तक सुनाई पड़ती थी। पर आज वह नीरव है, उस चौराहे का जवाब जिस पर उत्तर- दक्षिण, पूरब पश्चिम चारों ओर की राहें मिलती हैं और जिनके सहारे जीवन अविरल बहता है। जिसने कभी जल को जीवन की संज्ञा दी, उसने निश्चय जाना होगा कि | प्राणवान जीवन भी जल की ही भांति विकल, अविरल बहता है । सो प्राणवान जीवन, मानव संस्कृति का उल्लास उपहार लिए उन चारों राहों की संधि पर मिलता था जिसके एक कोण में उस प्रवाह से मिल एकांत शुष्क आज वह ठूंठ खड़ा है। उसके अभाग्यों की परंपरा में संभवतः एक ही सुखद अपबाट है उसके अंश का
प्रस्तुत गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक हो सकता है- ठूंठा आम
Key Points
- गद्यांश के अनुसार -
- रास्ते पर खड़ा ये आम का पेड़, सदा से ठूंठ नहीं है। दिन थे जब वह हरा भरा था और उस जनसंकुल चौराहे पर।
- अपनी छतनार डालियों से बटोहियों की थकान अनजाने दूर करता था। पर मैंने उसे सदा ठूंठ ही देखा है।
Additional Informationअन्य विकल्प -
- निस्पंद और नीरस वृक्ष - गद्यांश में 'निस्पंद और नीरस वृक्ष' शब्द से उपयुक्त शीर्षक का बोध नहीं हो रहा है।
- नीरस एवं अर्थहीन जीवन - गद्यांश में 'नीरस एवं अर्थहीन जीवन' शब्द से उपयुक्त शीर्षक का बोध नहीं हो रहा है।
- जंगल के वृक्ष - गद्यांश में 'जंगल के वृक्ष' शब्द से उपयुक्त शीर्षक का बोध नहीं हो रहा है।
प्रस्तुत गद्यांश को पढ़िए और उचित विकल्पों का चयन | करके उत्तर दीजिये:
रास्ते पर खड़ा ये आम का पेड़, सदा से ठूंठ नहीं है। दिन थे जब वह हरा भरा था और उस जनसंकुल चौराहे पर । अपनी छतनार डालियों से बटोहियों की थकान अनजाने दूर करता था। पर मैंने उसे सदा ठूंठ ही देखा है। पत्रहीन, शाखाहीन, निरवलंब, जैसे पृथ्वी रूपी आकाश से सहसा निकलकर अधर में ही टंग गया हो। रात में वह काले भूत-सा लगता है, दिन में उसकी छाया इतनी गहरी नहीं हो पाती जितना काला उसका जिस्म है और अगर चितेरे। को छायाचित्र बनाना हो तो शायद उसका-सा 'अभिप्राय' और न मिलेगा। प्रचंड धूप में भी उसका सूखा शरीर उतनी ही गहरी छाया ज़मीन पर डालता जैसे रात की उजियारी चांदनी में जब से होश संभाला है, जब से आँख खोली है, देखने का अभ्यास किया है, तब से बराबर मुझे उसका निस्पंद, नीरस, अर्थहीन शरीर ही दिख पड़ा है।
पर पिछली पीढ़ी के जानकार कहते हैं कि एक जमाना था जब पीपल और बरगद भी उसके सामने शरमाते थे और उसके पत्तों से, उसकी टहनियों और डालों से टकराती हवा की सरसराहट दूर तक सुनाई पड़ती थी। पर आज वह नीरव है, उस चौराहे का जवाब जिस पर उत्तर- दक्षिण, पूरब पश्चिम चारों ओर की राहें मिलती हैं और जिनके सहारे जीवन अविरल बहता है। जिसने कभी जल को जीवन की संज्ञा दी, उसने निश्चय जाना होगा कि | प्राणवान जीवन भी जल की ही भांति विकल, अविरल बहता है । सो प्राणवान जीवन, मानव संस्कृति का उल्लास उपहार लिए उन चारों राहों की संधि पर मिलता था जिसके एक कोण में उस प्रवाह से मिल एकांत शुष्क आज वह ठूंठ खड़ा है। उसके अभाग्यों की परंपरा में संभवतः एक ही सुखद अपबाट है उसके अंश का
जनसंकुल का आशय है - भीड़-भाड़ से भरे
Key Points
- 'जनसंकुल' का अर्थ - भीड़भरा समूह यानी जनसमूह।
- 'जन' का मतलब आम लोगों से है और 'संकुल' का मतलब घने समूह से होता है।
- जैसे - मैदान में अपार जनसंकुल दिखाई दे रहा है।
Additional Information
- 'जनसंपर्क' का अर्थ - सरकार का जनता से संपर्क बनानेवाला अधिकारी।
- 'जनसमूह' का अर्थ - आम जनता का मजमा या सर्वसाधारण लोगों का समुदाय।
- 'जनजीवन' का अर्थ - लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी।
प्रस्तुत गद्यांश को पढ़िए और उचित विकल्पों का चयन | करके उत्तर दीजिये:
रास्ते पर खड़ा ये आम का पेड़, सदा से ठूंठ नहीं है। दिन थे जब वह हरा भरा था और उस जनसंकुल चौराहे पर । अपनी छतनार डालियों से बटोहियों की थकान अनजाने दूर करता था। पर मैंने उसे सदा ठूंठ ही देखा है। पत्रहीन, शाखाहीन, निरवलंब, जैसे पृथ्वी रूपी आकाश से सहसा निकलकर अधर में ही टंग गया हो। रात में वह काले भूत-सा लगता है, दिन में उसकी छाया इतनी गहरी नहीं हो पाती जितना काला उसका जिस्म है और अगर चितेरे। को छायाचित्र बनाना हो तो शायद उसका-सा 'अभिप्राय' और न मिलेगा। प्रचंड धूप में भी उसका सूखा शरीर उतनी ही गहरी छाया ज़मीन पर डालता जैसे रात की उजियारी चांदनी में जब से होश संभाला है, जब से आँख खोली है, देखने का अभ्यास किया है, तब से बराबर मुझे उसका निस्पंद, नीरस, अर्थहीन शरीर ही दिख पड़ा है।
पर पिछली पीढ़ी के जानकार कहते हैं कि एक जमाना था जब पीपल और बरगद भी उसके सामने शरमाते थे और उसके पत्तों से, उसकी टहनियों और डालों से टकराती हवा की सरसराहट दूर तक सुनाई पड़ती थी। पर आज वह नीरव है, उस चौराहे का जवाब जिस पर उत्तर- दक्षिण, पूरब पश्चिम चारों ओर की राहें मिलती हैं और जिनके सहारे जीवन अविरल बहता है। जिसने कभी जल को जीवन की संज्ञा दी, उसने निश्चय जाना होगा कि | प्राणवान जीवन भी जल की ही भांति विकल, अविरल बहता है । सो प्राणवान जीवन, मानव संस्कृति का उल्लास उपहार लिए उन चारों राहों की संधि पर मिलता था जिसके एक कोण में उस प्रवाह से मिल एकांत शुष्क आज वह ठूंठ खड़ा है। उसके अभाग्यों की परंपरा में संभवतः एक ही सुखद अपबाट है उसके अंश का
आम की छतनार डालियों के कारण होता था- यात्रियों की थकान मिटती थी और विश्राम मिलता था ।
Key Points
- गद्यांश के अनुसार -
- दिन थे जब वह हरा भरा था और उस जनसंकुल चौराहे पर ।
- अपनी छतनार डालियों से बटोहियों की थकान अनजाने दूर करता था।
- पर मैंने उसे सदा ठूंठ ही देखा है। पत्रहीन, शाखाहीन, निरवलंब,
- जैसे पृथ्वी रूपी आकाश से सहसा निकलकर अधर में ही टंग गया हो।
Additional Informationअन्य विकल्प -
- यात्रियों को आम के फल खाने को मिलते थे । - गद्यांश में 'यात्रियों को आम के फल खाने' की चर्चा कही भी नहीं की गयी है।
- चारों ओर अँधेरा होता था । - गद्यांश में 'चारों ओर अँधेरा' की चर्चा कही भी नहीं की गयी है।
- यात्रियों को प्राणवायु मिलती थी। - गद्यांश में 'यात्रियों को प्राणवायु' की चर्चा कही भी नहीं की गयी है।
निर्देश:- दिए गए काव्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए।
यह न स्वत्व का त्याग, दान तो जीवन का झरना है
रखना उसको रोक मृत्यु के पहले ही मरना है।
किस पर करते कृपा वृक्ष यदि अपना फल देते है?
गिरने से उसको सँभाल क्यों रोक नहीं लेते है?
ऋतु के बाद फलों का रुकना डालों का सड़ना है
मोह दिखाना देय वस्तु पर आत्मघात करना है
देते तरु इसलिए कि रेशों में ना कीट समाएँ
रहें डाालियाँ स्वस्थ्य और फिर नए-नए फल आएँ
कविता का मुख्य स्वर है- दान का महत्त्व
Key Points
- कविता का मुख्य स्वर 'दान का महत्त्व' है।
- कवि ने दान को जीवन के झरने से तुलना की है, और स्वत्व का त्याग करने को मृत्यु से पहले मरना कहा है।
- कवि वृक्ष की प्रकृति का उदाहरण देते हैं, जो अपने फल देते हैं बिना किसी भेदभाव के।
- वे यह भी कहते हैं कि देय वस्तु पर मोह दिखाना आत्मघात है।
Additional Informationव्याख्या:
- इस कविता में कवि ने दान का महत्त्व स्पष्ट किया है।
- उन्होंने दान को जीवन के झरने की तरह वर्णित किया है, जो अपना पानी बहाता है और उसे रोकना मृत्यु से कम नहीं होता।
- कवि ने वृक्ष का उदाहरण देकर बताया है कि वह अपने फल किसे दे रहा है, इस पर विचार नहीं करता।
- वह केवल देता है, और उसके द्वारा दिए गए फलों को गिरने नहीं देता।
- वृक्ष की तरह, हमें भी दान करना चाहिए, बिना किसी भेदभाव या स्वार्थ के।
- इसके अलावा, कवि ने यह भी स्पष्ट किया है कि देय वस्तु पर मोह दिखाना, यानी उसे देने से कतराना, आत्मघात है।
- आखिरी पंक्तियों में कवि ने यह बताया है कि वृक्ष उसीलिए फल देता है ताकि उसकी डालों में कीट न समाएं और वह स्वस्थ्य रह सके।
- इसे कवि ने मनुष्य जीवन से जोड़कर दान करने की महत्ता को बताया है।
निर्देश:- दिए गए काव्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए।
यह न स्वत्व का त्याग, दान तो जीवन का झरना है
रखना उसको रोक मृत्यु के पहले ही मरना है।
किस पर करते कृपा वृक्ष यदि अपना फल देते है?
गिरने से उसको सँभाल क्यों रोक नहीं लेते है?
ऋतु के बाद फलों का रुकना डालों का सड़ना है
मोह दिखाना देय वस्तु पर आत्मघात करना है
देते तरु इसलिए कि रेशों में ना कीट समाएँ
रहें डाालियाँ स्वस्थ्य और फिर नए-नए फल आएँ
दान के संबंध में कथन सही है- वृक्ष भी फलों का दान करते है।
Key Points
- यह कविता 'दान का महत्त्व' पर आधारित है और उसके विभिन्न पहलुओं को उजागर करती है।
- कविता में दान को वृक्ष की तुलना से समझाया गया है, जो अपने फलों का दान करता है।
Additional Informationव्याख्या:
- इस कविता में, कवि ने दान का महत्व स्पष्ट किया है और इसे जीवन के झरने से तुलना की है, जो स्वतन्त्र रूप से अपना पानी बहाता है।
- दान को स्वत्व का त्याग नहीं, बल्कि एक जीवन्त प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है।
- कवि ने वृक्ष की प्रकृति का उदाहरण दिया है, जो अपने फलों को दान करता है बिना किसी भेदभाव या अपेक्षा के।
- वृक्ष के द्वारा दिए गए फलों को गिरने नहीं देता, वह केवल देता है।
- इस कविता के माध्यम से, कवि ने यह सिखाने की कोशिश की है कि हमें दान करना चाहिए, बिना किसी आपेक्षिकता या भेदभाव के।
- देय वस्तु पर मोह दिखाना और इसे देने से कतराना, यह आत्मघात है, क्योंकि यह हमारे विकास और प्रगति को रोकता है।
- इसलिए, दान करने से हमारा जीवन नवीनता और प्रगति की ओर बढ़ता है।
निर्देश:- दिए गए काव्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए।
यह न स्वत्व का त्याग, दान तो जीवन का झरना है
रखना उसको रोक मृत्यु के पहले ही मरना है।
किस पर करते कृपा वृक्ष यदि अपना फल देते है?
गिरने से उसको सँभाल क्यों रोक नहीं लेते है?
ऋतु के बाद फलों का रुकना डालों का सड़ना है
मोह दिखाना देय वस्तु पर आत्मघात करना है
देते तरु इसलिए कि रेशों में ना कीट समाएँ
रहें डाालियाँ स्वस्थ्य और फिर नए-नए फल आएँ
कविता के आधार पर बताइए, पेड़ अपने फल देकर दूसरों पर कृपा नहीं करते है।
Key Points
- यह कविता 'दान का महत्त्व' पर आधारित है और उसके विभिन्न पहलुओं को उजागर करती है।
- कविता में दान को वृक्ष की तुलना से समझाया गया है, जो अपने फलों का दान करता है।
- वृक्ष अपने फल देने से दूसरों पर कृपा नहीं कर रहा है, बल्कि यह उसकी प्रकृति का हिस्सा है।
Additional Informationव्याख्या:
- इस कविता में, कवि ने दान का महत्व स्पष्ट किया है और इसे जीवन के झरने से तुलना की है, जो स्वतन्त्र रूप से अपना पानी बहाता है।
- दान को स्वत्व का त्याग नहीं, बल्कि एक जीवन्त प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है।
- कवि ने वृक्ष की प्रकृति का उदाहरण दिया है, जो अपने फलों को दान करता है बिना किसी भेदभाव या अपेक्षा के।
- वृक्ष के द्वारा दिए गए फलों को गिरने नहीं देता, वह केवल देता है।
- इस कविता के माध्यम से, कवि ने यह सिखाने की कोशिश की है कि हमें दान करना चाहिए, बिना किसी आपेक्षिकता या भेदभाव के।
- देय वस्तु पर मोह दिखाना और इसे देने से कतराना, यह आत्मघात है, क्योंकि यह हमारे विकास और प्रगति को रोकता है।
- इसलिए, दान करने से हमारा जीवन नवीनता और प्रगति की ओर बढ़ता है।
निर्देश:- दिए गए काव्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए।
यह न स्वत्व का त्याग, दान तो जीवन का झरना है
रखना उसको रोक मृत्यु के पहले ही मरना है।
किस पर करते कृपा वृक्ष यदि अपना फल देते है?
गिरने से उसको सँभाल क्यों रोक नहीं लेते है?
ऋतु के बाद फलों का रुकना डालों का सड़ना है
मोह दिखाना देय वस्तु पर आत्मघात करना है
देते तरु इसलिए कि रेशों में ना कीट समाएँ
रहें डाालियाँ स्वस्थ्य और फिर नए-नए फल आएँ
पेड़ों से फलों का उतरना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि इससे पेड़ों की डालों को हानि नहीं होती।
Key Points
- कविता के आधार पर, पेड़ों से फलों का उतरना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि इससे "पेड़ों की डालों को हानि नहीं होती।"
Additional Informationव्याख्या:
- कविता में कवि ने वृक्ष के फलों को उसकी डालों से गिरने की अनिवार्यता का चित्रण किया है।
- कवि कहते हैं कि फलों का उतरना अनिवार्य है क्योंकि यदि वे डालों पर ही रहते हैं तो वे सड़ जाएंगे और डालों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
- इसके अलावा, फलों का उतरना डालों के लिए अच्छा होता है क्योंकि इससे वे नए फलों को उत्पन्न कर सकते हैं।
- इसलिए, यह कविता हमें यह सिखाती है कि दान और साझा करने में ही असली उत्कृष्टता और वृद्धि है, चाहे वह प्रकृति हो या मानव समाज।
- जैसे कि वृक्ष अपने फलों को देकर अपनी वृद्धि और उत्पादकता को बनाए रखता है, वैसे ही मानव समाज भी दान और साझेदारी के माध्यम से अपने स्वस्थ्य और समृद्धि को बनाए रख सकता है।
निर्देश:- दिए गए काव्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए।
यह न स्वत्व का त्याग, दान तो जीवन का झरना है
रखना उसको रोक मृत्यु के पहले ही मरना है।
किस पर करते कृपा वृक्ष यदि अपना फल देते है?
गिरने से उसको सँभाल क्यों रोक नहीं लेते है?
ऋतु के बाद फलों का रुकना डालों का सड़ना है
मोह दिखाना देय वस्तु पर आत्मघात करना है
देते तरु इसलिए कि रेशों में ना कीट समाएँ
रहें डाालियाँ स्वस्थ्य और फिर नए-नए फल आएँ
समूह से भिन्न शब्द-युग्म हैं- धीरे-धीरे हँसना
Key Points
- नए-नए फल, नए-पुराने कपड़, और सुन्दर-सुन्दर फूल में दोनों शब्द समान हैं और वे एक समान विशेषण को दोहराते हैं जो अपनी संज्ञा को और अधिक बल देते हैं।
- हालांकि, "धीरे-धीरे हँसना" में, "धीरे-धीरे" एक क्रिया की गति का विशेषण है, जबकि "हँसना" एक क्रिया है।
संस्कृति और सभ्यता - ये दो शब्द हैं और उनके अर्थ भी अलग - अलग हैं। सभ्यता मनुष्य का वह गुण है जिससे वह अपनी बाहरी तरक्की करता है। संस्कृति वह गुण है जिससे वह अपनी भीतरी उन्नति करता है, करुणा, प्रेम और। परोपकार सीखता है। आज रेलगाड़ी, मोटर और हवाई जहाज, लम्बी-चौड़ी सड़कें और बड़े - बड़े मकान, अच्छा भोजन और अच्छी पोशाक, ये सभ्यता की पहचान हैं और जिस देश में इनकी जितनी ही अधिकता है उस देश को हम उतना ही सभ्य मानते हैं। मगर संस्कृति उन सबसे कहीं बारीक चीज है। वह मोटर नहीं, मोटर बनाने की कला है; मकान नहीं, मकान बनाने की रुचि है। संस्कृति धन नहीं, गुण है। संस्कृति ठाठ - बाट नहीं, विनय और विनम्रता है। एक कहावत है कि सभ्यता वह चीज़ है जो हमारे पास है, लेकिन संस्कृति वह गुण है जो हममें छिपा हुआ है। हमारे पास घर होता है, कपड़े-लत्ते होते हैं, मगर ये सारी चीजें हमारी सभ्यता के सबूत हैं, जबकि संस्कृति इतने मोटे तौर पर दिखलाई नहीं देती, वह बहुत ही सूक्ष्म और महान चीज़ है और वह हमारी हर पसंद, हर आदत में छिपी रहती है। मकान बनाना सभ्यता का काम है, लेकिन हम मकान का कौन-सा नक़्शा पसंद करते हैं- यह हमारी संस्कृति बतलाती है। आदमी के भीतर काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मत्सर ये छ: विकार प्रकृति के दिए हुए हैं। मगर ये विकार अगर बेरोक छोड़ दिए जायें, तो आदमी इतना गिर जाए कि उसमें और जानवर में कोई भेद नहीं रह जाये । इसलिए आदमी इन विकारों पर रोक लगाता है। इन दुर्गुणों पर जो आदमी जितना ज्यादा क़ाबू कर पाता है, उसकी संस्कृति भी उतनी ही ऊँची समझी जाती है। संस्कृति का स्वभाव है कि वह आदान-प्रदान से बढ़ती है। जब दो देशों या जातियों के लोग आपस में मिलते हैं तब उन दोनों की संस्कृतियाँ एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं। इसलिए संस्कृति की दृष्टि से वह जाति या वह देश बहुत ही धनी समझा जाता है जिसने ज्यादा-से-ज्यादा देशों या जातियों की संस्कृतियों से लाभ उठाकर अपनी संस्कृति का विकास किया हो।
'सभ्यता' का अभिप्राय है : मानव के भौतिक विकास का विधायक गुण
Key Points
- गद्यांश के अनुसार -
- संस्कृति और सभ्यता - ये दो शब्द हैं और उनके अर्थ भी अलग - अलग हैं।
- सभ्यता मनुष्य का वह गुण है जिससे वह अपनी बाहरी तरक्की करता है।
- संस्कृति वह गुण है जिससे वह अपनी भीतरी उन्नति करता है, करुणा, प्रेम और। परोपकार सीखता है।
- आज रेलगाड़ी, मोटर और हवाई जहाज, लम्बी-चौड़ी सड़कें और बड़े - बड़े मकान, अच्छा भोजन और अच्छी पोशाक,
Additional Information
- मानव को कलाकार बना देने वाली विशेषता
- गद्यांश में 'सभ्यता' के अभिप्राय में इसकी चर्चा कही भी नहीं की गयी।
- मनुष्य के स्वाधीन चिंतन की गाथा
- गद्यांश में 'सभ्यता' के अभिप्राय में इसकी चर्चा कही भी नहीं की गयी।
- युग-युग की ऐश्वर्यपूर्ण कहानी
- गद्यांश में 'सभ्यता' के अभिप्राय में इसकी चर्चा कही भी नहीं की गयी।
संस्कृति और सभ्यता - ये दो शब्द हैं और उनके अर्थ भी अलग - अलग हैं। सभ्यता मनुष्य का वह गुण है जिससे वह अपनी बाहरी तरक्की करता है। संस्कृति वह गुण है जिससे वह अपनी भीतरी उन्नति करता है, करुणा, प्रेम और। परोपकार सीखता है। आज रेलगाड़ी, मोटर और हवाई जहाज, लम्बी-चौड़ी सड़कें और बड़े - बड़े मकान, अच्छा भोजन और अच्छी पोशाक, ये सभ्यता की पहचान हैं और जिस देश में इनकी जितनी ही अधिकता है उस देश को हम उतना ही सभ्य मानते हैं। मगर संस्कृति उन सबसे कहीं बारीक चीज है। वह मोटर नहीं, मोटर बनाने की कला है; मकान नहीं, मकान बनाने की रुचि है। संस्कृति धन नहीं, गुण है। संस्कृति ठाठ - बाट नहीं, विनय और विनम्रता है। एक कहावत है कि सभ्यता वह चीज़ है जो हमारे पास है, लेकिन संस्कृति वह गुण है जो हममें छिपा हुआ है। हमारे पास घर होता है, कपड़े-लत्ते होते हैं, मगर ये सारी चीजें हमारी सभ्यता के सबूत हैं, जबकि संस्कृति इतने मोटे तौर पर दिखलाई नहीं देती, वह बहुत ही सूक्ष्म और महान चीज़ है और वह हमारी हर पसंद, हर आदत में छिपी रहती है। मकान बनाना सभ्यता का काम है, लेकिन हम मकान का कौन-सा नक़्शा पसंद करते हैं- यह हमारी संस्कृति बतलाती है। आदमी के भीतर काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मत्सर ये छ: विकार प्रकृति के दिए हुए हैं। मगर ये विकार अगर बेरोक छोड़ दिए जायें, तो आदमी इतना गिर जाए कि उसमें और जानवर में कोई भेद नहीं रह जाये । इसलिए आदमी इन विकारों पर रोक लगाता है। इन दुर्गुणों पर जो आदमी जितना ज्यादा क़ाबू कर पाता है, उसकी संस्कृति भी उतनी ही ऊँची समझी जाती है। संस्कृति का स्वभाव है कि वह आदान-प्रदान से बढ़ती है। जब दो देशों या जातियों के लोग आपस में मिलते हैं तब उन दोनों की संस्कृतियाँ एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं। इसलिए संस्कृति की दृष्टि से वह जाति या वह देश बहुत ही धनी समझा जाता है जिसने ज्यादा-से-ज्यादा देशों या जातियों की संस्कृतियों से लाभ उठाकर अपनी संस्कृति का विकास किया हो।
मानव की मानवीयता इसी बात में निहित है कि, वह अपने मन से विद्यमान विकारों पर नियंत्रण पाने की चेष्टा करे।
Key Points
- गद्यांश के अनुसार -
- आदमी के भीतर काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मत्सर ये छ: विकार प्रकृति के दिए हुए हैं।
- मगर ये विकार अगर बेरोक छोड़ दिए जायें, तो आदमी इतना गिर जाए
- कि उसमें और जानवर में कोई भेद नहीं रह जाये । इसलिए आदमी इन विकारों पर रोक लगाता है।
- इन दुर्गुणों पर जो आदमी जितना ज्यादा क़ाबू कर पाता है, उसकी संस्कृति भी उतनी ही ऊँची समझी जाती है।
Additional Informationगद्यांश में इन वाक्यों की चर्चा नहीं हुई है -
- अपनी सभ्यता और संस्कृति का प्रचार करे।
- अपनी संस्कृति को समृद्ध करने के लिए कटिबद्ध रहे।
- सभ्यता की ऊँचाइयों को पाने का प्रयास करे।
संस्कृति और सभ्यता - ये दो शब्द हैं और उनके अर्थ भी अलग - अलग हैं। सभ्यता मनुष्य का वह गुण है जिससे वह अपनी बाहरी तरक्की करता है। संस्कृति वह गुण है जिससे वह अपनी भीतरी उन्नति करता है, करुणा, प्रेम और। परोपकार सीखता है। आज रेलगाड़ी, मोटर और हवाई जहाज, लम्बी-चौड़ी सड़कें और बड़े - बड़े मकान, अच्छा भोजन और अच्छी पोशाक, ये सभ्यता की पहचान हैं और जिस देश में इनकी जितनी ही अधिकता है उस देश को हम उतना ही सभ्य मानते हैं। मगर संस्कृति उन सबसे कहीं बारीक चीज है। वह मोटर नहीं, मोटर बनाने की कला है; मकान नहीं, मकान बनाने की रुचि है। संस्कृति धन नहीं, गुण है। संस्कृति ठाठ - बाट नहीं, विनय और विनम्रता है। एक कहावत है कि सभ्यता वह चीज़ है जो हमारे पास है, लेकिन संस्कृति वह गुण है जो हममें छिपा हुआ है। हमारे पास घर होता है, कपड़े-लत्ते होते हैं, मगर ये सारी चीजें हमारी सभ्यता के सबूत हैं, जबकि संस्कृति इतने मोटे तौर पर दिखलाई नहीं देती, वह बहुत ही सूक्ष्म और महान चीज़ है और वह हमारी हर पसंद, हर आदत में छिपी रहती है। मकान बनाना सभ्यता का काम है, लेकिन हम मकान का कौन-सा नक़्शा पसंद करते हैं- यह हमारी संस्कृति बतलाती है। आदमी के भीतर काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मत्सर ये छ: विकार प्रकृति के दिए हुए हैं। मगर ये विकार अगर बेरोक छोड़ दिए जायें, तो आदमी इतना गिर जाए कि उसमें और जानवर में कोई भेद नहीं रह जाये । इसलिए आदमी इन विकारों पर रोक लगाता है। इन दुर्गुणों पर जो आदमी जितना ज्यादा क़ाबू कर पाता है, उसकी संस्कृति भी उतनी ही ऊँची समझी जाती है। संस्कृति का स्वभाव है कि वह आदान-प्रदान से बढ़ती है। जब दो देशों या जातियों के लोग आपस में मिलते हैं तब उन दोनों की संस्कृतियाँ एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं। इसलिए संस्कृति की दृष्टि से वह जाति या वह देश बहुत ही धनी समझा जाता है जिसने ज्यादा-से-ज्यादा देशों या जातियों की संस्कृतियों से लाभ उठाकर अपनी संस्कृति का विकास किया हो।
'संस्कृति' का अभिप्राय है : मानव की आत्मिक उन्नति का संवर्धक आन्तरिक गुण
Key Points
- गद्यांश के अनुसार-
- संस्कृति वह गुण है जिससे वह अपनी भीतरी उन्नति करता है, करुणा, प्रेम और। परोपकार सीखता है।
- आज रेलगाड़ी, मोटर और हवाई जहाज, लम्बी-चौड़ी सड़कें और बड़े - बड़े मकान, अच्छा भोजन और अच्छी पोशाक,
- ये सभ्यता की पहचान हैं और जिस देश में इनकी जितनी ही अधिकता है उस देश को हम उतना ही सभ्य मानते हैं।
Additional Information
| शब्द | अर्थ |
| आत्मिक | आत्मा का, आत्मा से संबंधित। |
| उन्नति | आगे बढ़ने की क्रिया या प्रक्रिया। |
| संवर्धक | बढ़ाने वाला या जिसकी वज़ह से वृद्धि हो। |
| आन्तरिक | भीतरी बातों से संबंधित, अंतरंग। |
| प्रासंगिक | प्रसंग से संबंध रखनेवाला। |
| विशिष्टता | अनोखा होने का गुण या अवस्था। |
| सन्तुलित | ठीक ढंग से तौला हुआ। |
| विधान | कानून बनाने या अधिनियमित करने का कार्य। |
संस्कृति और सभ्यता - ये दो शब्द हैं और उनके अर्थ भी अलग - अलग हैं। सभ्यता मनुष्य का वह गुण है जिससे वह अपनी बाहरी तरक्की करता है। संस्कृति वह गुण है जिससे वह अपनी भीतरी उन्नति करता है, करुणा, प्रेम और। परोपकार सीखता है। आज रेलगाड़ी, मोटर और हवाई जहाज, लम्बी-चौड़ी सड़कें और बड़े - बड़े मकान, अच्छा भोजन और अच्छी पोशाक, ये सभ्यता की पहचान हैं और जिस देश में इनकी जितनी ही अधिकता है उस देश को हम उतना ही सभ्य मानते हैं। मगर संस्कृति उन सबसे कहीं बारीक चीज है। वह मोटर नहीं, मोटर बनाने की कला है; मकान नहीं, मकान बनाने की रुचि है। संस्कृति धन नहीं, गुण है। संस्कृति ठाठ - बाट नहीं, विनय और विनम्रता है। एक कहावत है कि सभ्यता वह चीज़ है जो हमारे पास है, लेकिन संस्कृति वह गुण है जो हममें छिपा हुआ है। हमारे पास घर होता है, कपड़े-लत्ते होते हैं, मगर ये सारी चीजें हमारी सभ्यता के सबूत हैं, जबकि संस्कृति इतने मोटे तौर पर दिखलाई नहीं देती, वह बहुत ही सूक्ष्म और महान चीज़ है और वह हमारी हर पसंद, हर आदत में छिपी रहती है। मकान बनाना सभ्यता का काम है, लेकिन हम मकान का कौन-सा नक़्शा पसंद करते हैं- यह हमारी संस्कृति बतलाती है। आदमी के भीतर काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मत्सर ये छ: विकार प्रकृति के दिए हुए हैं। मगर ये विकार अगर बेरोक छोड़ दिए जायें, तो आदमी इतना गिर जाए कि उसमें और जानवर में कोई भेद नहीं रह जाये । इसलिए आदमी इन विकारों पर रोक लगाता है। इन दुर्गुणों पर जो आदमी जितना ज्यादा क़ाबू कर पाता है, उसकी संस्कृति भी उतनी ही ऊँची समझी जाती है। संस्कृति का स्वभाव है कि वह आदान-प्रदान से बढ़ती है। जब दो देशों या जातियों के लोग आपस में मिलते हैं तब उन दोनों की संस्कृतियाँ एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं। इसलिए संस्कृति की दृष्टि से वह जाति या वह देश बहुत ही धनी समझा जाता है जिसने ज्यादा-से-ज्यादा देशों या जातियों की संस्कृतियों से लाभ उठाकर अपनी संस्कृति का विकास किया हो।
संस्कृति का मूल स्वभाव है कि, वह आदान-प्रदान से बढ़ती है।
Key Points
- गद्यांश के अनुसार -
- इन दुर्गुणों पर जो आदमी जितना ज्यादा क़ाबू कर पाता है, उसकी संस्कृति भी उतनी ही ऊँची समझी जाती है।
- संस्कृति का स्वभाव है कि वह आदान-प्रदान से बढ़ती है। जब दो देशों या जातियों के लोग आपस में मिलते हैं
- तब उन दोनों की संस्कृतियाँ एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं।
Additional Information
- मानव-मानव में भेदभाव नहीं रखती ।
- गद्यांश में संस्कृति का मूल स्वभाव भेदभाव को नहीं माना गया है।
- मनुष्य की आत्मा में विश्वास रखती है।
- गद्यांश में संस्कृति का मूल स्वभाव आत्मा में विश्वास को नहीं माना गया है।
- एक समुदाय के जीवन में ही जीवित रह सकती है।
- गद्यांश में संस्कृति का मूल स्वभाव समुदाय के जीवन में ही जीवित नहीं रह सकती है।
संस्कृति और सभ्यता - ये दो शब्द हैं और उनके अर्थ भी अलग - अलग हैं। सभ्यता मनुष्य का वह गुण है जिससे वह अपनी बाहरी तरक्की करता है। संस्कृति वह गुण है जिससे वह अपनी भीतरी उन्नति करता है, करुणा, प्रेम और। परोपकार सीखता है। आज रेलगाड़ी, मोटर और हवाई जहाज, लम्बी-चौड़ी सड़कें और बड़े - बड़े मकान, अच्छा भोजन और अच्छी पोशाक, ये सभ्यता की पहचान हैं और जिस देश में इनकी जितनी ही अधिकता है उस देश को हम उतना ही सभ्य मानते हैं। मगर संस्कृति उन सबसे कहीं बारीक चीज है। वह मोटर नहीं, मोटर बनाने की कला है; मकान नहीं, मकान बनाने की रुचि है। संस्कृति धन नहीं, गुण है। संस्कृति ठाठ - बाट नहीं, विनय और विनम्रता है। एक कहावत है कि सभ्यता वह चीज़ है जो हमारे पास है, लेकिन संस्कृति वह गुण है जो हममें छिपा हुआ है। हमारे पास घर होता है, कपड़े-लत्ते होते हैं, मगर ये सारी चीजें हमारी सभ्यता के सबूत हैं, जबकि संस्कृति इतने मोटे तौर पर दिखलाई नहीं देती, वह बहुत ही सूक्ष्म और महान चीज़ है और वह हमारी हर पसंद, हर आदत में छिपी रहती है। मकान बनाना सभ्यता का काम है, लेकिन हम मकान का कौन-सा नक़्शा पसंद करते हैं- यह हमारी संस्कृति बतलाती है। आदमी के भीतर काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मत्सर ये छ: विकार प्रकृति के दिए हुए हैं। मगर ये विकार अगर बेरोक छोड़ दिए जायें, तो आदमी इतना गिर जाए कि उसमें और जानवर में कोई भेद नहीं रह जाये । इसलिए आदमी इन विकारों पर रोक लगाता है। इन दुर्गुणों पर जो आदमी जितना ज्यादा क़ाबू कर पाता है, उसकी संस्कृति भी उतनी ही ऊँची समझी जाती है। संस्कृति का स्वभाव है कि वह आदान-प्रदान से बढ़ती है। जब दो देशों या जातियों के लोग आपस में मिलते हैं तब उन दोनों की संस्कृतियाँ एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं। इसलिए संस्कृति की दृष्टि से वह जाति या वह देश बहुत ही धनी समझा जाता है जिसने ज्यादा-से-ज्यादा देशों या जातियों की संस्कृतियों से लाभ उठाकर अपनी संस्कृति का विकास किया हो।
संस्कृति सभ्यता से इस रूप में भी भिन्न है कि, संस्कृति सभ्यता की अपेक्षा अत्यन्त सूक्ष्म होती है।
Key Points
- गद्यांश के अनुसार -
- एक कहावत है कि सभ्यता वह चीज़ है जो हमारे पास है, लेकिन संस्कृति वह गुण है जो हममें छिपा हुआ है।
- हमारे पास घर होता है, कपड़े-लत्ते होते हैं, मगर ये सारी चीजें हमारी सभ्यता के सबूत हैं,
- जबकि संस्कृति इतने मोटे तौर पर दिखलाई नहीं देती, वह बहुत ही सूक्ष्म और महान चीज़ है
- और वह हमारी हर पसंद, हर आदत में छिपी रहती है। मकान बनाना सभ्यता का काम है,
- लेकिन हम मकान का कौन-सा नक़्शा पसंद करते हैं- यह हमारी संस्कृति बतलाती है।
Additional Information
| शब्द | अर्थ |
| सूक्ष्म | बेहद छोटा, बहुत छोटा। |
| स्थूल | जिसके अंग फूले हुए या भारी हों, मोटा। |
| विशद | स्वच्छ, निर्मल, उज्ज्वल। |
| यथार्थ | जैसा होना चाहिए ठीक वैसा। |
| समन्वयमूलक | नियमित क्रम से उत्पन्न करनेवाला। |
| नितान्त | पूरी तरह से या थोड़ी मात्रा में भी। |
'चमक उठी सन् सत्तावन में वो तलवार पुरानी थी।' रस भेद होगा - वीर रस
Key Points
- 'चमक उठी सन् सत्तावन में, वो तलवार पुरानी थी' पंक्तियों में वीर रस है।
- (इन पंक्तियों में कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने झाँसी की रानी के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान का वर्णन किया है।)
- इस रस के अंतर्गत जब युद्ध अथवा कठिन कार्य को करने के लिए मन में जो उत्साह की भावना विकसित होती है, उसे ही वीर रस कहते हैं।
- इसमें शत्रु पर विजय प्राप्त करने, यश प्राप्त करने आदि प्रकट होती है इसका स्थायी भाव उत्साह होता है।
- उदाहरण -
- बुंदेले हर बोलो के मुख हमने सुनी कहानी थी।
- खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी।।
Important Points
| रस | स्थायी भाव |
| शृंगार | रति |
| करुण | शोक |
| हास्य | हास |
| वीर | उत्साह |
| भयानक | भय |
| रौद्र | क्रोध |
| अद्भुत | आश्चर्य , विस्मय |
| शांत | निर्वेद या निर्वृती |
| वीभत्स | जुगुप्सा |
| वात्सल्य | रति |
Additional Information
|
भक्ति रस:-
उदाहरण -
हास्य रस-
उदाहरण -
श्रृंगार रस-
उदाहरण -
|
संधि की दृष्टि से स्वागत - दीर्घ स्वर संधि ये युग्म अनुचित है।
- जब इ, ई, उ, ऊ, ऋ के आगे कोई भिन्न स्वर आता है तो ये क्रमश: य, व, र में परिवर्तित हो जाते हैं, इस परिवर्तन को यण सन्धि कहते हैं।
यण संधि के नियम -
- इ/ई + अ/आ/उ/ऊ = य
- उ/ऊ + इ/ई/अ/आ = व्
- ऋ + अ/आ/उ/ऊ/इ/ई = र
- स्वागत यण संधि है।
- यण संधि (उ + आ = वा)
स्वागत = सु + आगत
Key Pointsअन्य विकल्प -
- व्यंजन संधि
तल्लीन = तत् + लीन - यण स्वर संधि
मात्रिच्छा = मातृ + इच्छा - विसर्ग संधि
मनश्चिकित्सा = मन: + चिकित्सा
Additional Informationसंधि तीन प्रकार के होते हैं -
स्वर संधि
- दीर्घ संधि
- अ/आ + अ/आ = आ
- इ/ई + इ/ई = ई
- उ + उ = ऊ
- गुण संधि
- अ/आ + उ/ऊ = ओ
- अ/आ + इ/ई = ए
- अ + ऋ = अर्
- वृद्धि संधि
- अ/आ + ए/ऐ = ऐ
- अ/आ + ओ/औ = औ
- यण संधि
- इ/ई + अ/आ/उ/ऊ = य
- उ/ऊ + इ/ई/अ/आ = व्
- ऋ + अ/आ/उ/ऊ/इ/ई = र
- अयादी संधि
- ए + अन्य स्वर = अय
- ऐ + अन्य स्वर = आय
- ओ + अन्य स्वर = अव
- औ + अन्य स्वर = आव
- व्यंजन सन्धि
- विसर्ग सन्धि
अध्यक्ष महानगर पालिका को लिखे गए पत्र को औपचारिक पत्र कहेंगे।
Key Points
| प्रकार | परिभाषा |
| औपचारिक पत्र | उन्हें लिखा जाता है जिनसे हमारा कोई निजी संबंध ना हो। व्यवसाय से संबंधित, प्रधानाचार्य को लिखे प्रार्थना पत्र, आवेदन पत्र, सरकारी विभागों को लिखे गए पत्र, संपादक के नाम पत्र आदि औपचारिक-पत्र कहलाते हैं। |
Important Pointsअनौपचारिक पत्र-
- जिन लोगों से निजी संबंध होते हैं, उन्हें अनौपचारिक पत्र (इनफॉर्मल लेटर) लिखे जाते हैं। इस प्रकार के पत्रों में व्यक्ति अपने मन की बातों, भावनाओं सुख-दुख की बातों आदि को लिखते हैं।
व्यक्तिगत पत्र -
- वैयक्तिक पत्र से तात्पर्य ऐसे पत्रों से हैं, जिन्हें व्यक्तिगत मामलों के सम्बन्ध में पारिवारिक सदस्यों, मित्रों एवं अन्य प्रियजनों को लिखा जाता हैं।
- वैयक्तिक पत्र का आधार व्यक्तिगत सम्बन्ध होता हैं।
व्यावसायिक पत्र-
- वाणिज्य और व्यापार के विकास के लिए लिखे जाने वाले पत्र व्यावसायिक या व्यापारिक पत्र कहे जाते हैं। यह पत्र व्यापारिक कार्य, भावों की पूछताछ, आदेश भेजना, बकाया राशि के लिए तगादा करना आदि विषयों से जुड़े होते हैं।
Additional Information
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प्रकार |
परिभाषा |
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पत्र |
'पत्र' का शाब्दिक अर्थ हैं, 'ऐसा कागज जिस पर कोई बात लिखी अथवा छपी हो'। पत्र के द्वारा व्यक्ति अपनी बातों को दूसरों तक लिखकर पहुँचाता हैं। हम पत्र को अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम भी कह सकते हैं। |
शिल्पगत आधार पर दोहे से उल्टा छंद सोरठा है।
दोहे का उल्टा सोरठा
- दोहा एक अर्थ सम मात्रिक छंद है।
- दोहे के प्रथम एवं तृतीय चरण में 13-13 मात्रायें एवं दूसरे तथा चौथे चरण में 11-11 मात्रायें होती हैं।
I I S S S S I S
कथनी मीठी खांड-सी,
I I S I I S S I
करनी विष की लोए।
I I S I I I I S I S
कथनी तजि करनी करें ,
I I S I I I I S I
विष से अमरित होय।
- सोरठा एक अर्थ सम मात्रिक छंद है।
- सोरठा के प्रथम एवं तृतीय चरण में 11-11 और दूसरे तथा चौथे चरण में 13-13 मात्रायें होती हैं।
I I I I I I I I S I
निज मन मुकुर सुधार।
S I I I I I I S I I I
श्री गुरु चरण सरोज रज,
S S I I I I S I
जो दायक फल चार।
I I S I I I I I I I I I
बरनौ रघुवर विमल जस
Important Pointsदोहा का उदाहरण -
- मेरी भव बाधा हरो, राधा नागरि सोय।
जा तन की जाँई परे, श्याम हरित दुति होय॥
- करौ कुबत जग कुटिलता, तजौं न दीनदयाल।
दुःखी होहुगे सरल हिय, बसत त्रिभंगीलाल॥
- रकत ढुरा, ऑसू गए, हाड़ भयेउ सब संख।
धनि सारस होइ, गरि भुई, पीड समेटहि पंख॥
- मो सम दीन न दीन हित, तुम समान रघुवीर ।
अस विचारि रघुवंश मनि, हरहु विषम भवभीर॥
सोरठा का उदाहरण -
- जो सुमिरत सिधि होय, गननायक करिबर बदन।
करहु अनुग्रह सोय, बुद्धि रासि सुभ गुन सदन॥
- रहिमन हमें न सुहाय, अमिय पियावत मान विनु।
जो विष देय पिलाय, मान सहित मरिबो भलो।।
- तुलसी-सूर-विहारि-कृष्णभट्ट-भारवि-मुखाः।
भाषाकविताकारि-कवयः कस्य न सम्भता:॥
- जानि गौरि अनुकूल, सिय हिय हरषु न जाइ कहि।
मंजुल मंगल, मूल बाम, अंग फरकन लगे।।
Additional Informationमात्रिक छन्द -
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चौपाई |
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रोला |
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हरिगीतिका |
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दोहा |
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सोरठा |
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उल्लाला |
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छप्पय |
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बरवै |
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गीतिका |
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वीर |
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कुण्डलिया |
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'राष्ट्रीयता' शब्द है-
'राष्ट्रीयता' शब्द है - भाववाचक संज्ञा
Key Points
- 'राष्ट्रीयता' एक भाववाचक संज्ञा है, क्योंकि राष्ट्रीय अर्थात् राष्ट्र के अंग या सदस्य होने की अवस्था, धर्म या भाव है।
- जो शब्द किसी चीज़ या पदार्थ की अवस्था, दशा या भाव का बोध कराते हैं, उन शब्दों को भाववाचक संज्ञा कहते हैं।
- जैसे- बचपन, बुढ़ापा, मोटापा, मिठास, उमंग, चढाई, थकावट, मानवता, चतुराई, जवानी, लम्बाई, मित्रता, मुस्कुराहट, अपनापन, भूख, आदि।
- उदाहरण - मेरा बचपन खेलकूद में बीता
Important Points
| संज्ञा | परिभाषा | उदाहरण |
| जातिवाचक | जो शब्द किसी व्यक्ति, वस्तु या स्थान की संपूर्ण जाति का बोध कराते हैं, उन शब्दों को जातिवाचक संज्ञा कहते हैं।जैसे- मोबाइल, टीवी, गाँव, स्कूल, शहर, बगीचा, नदी, जानवर, पशु, पक्षी, गाय, लड़का आदि। |
कुत्ता एक वफादार जानवर होता है। |
| समूहवाचक | जिन संज्ञा शब्दों से किसी भी व्यक्ति या वस्तु के समूह का बोध होता है, उन शब्दों को समूहवाचक या समुदायवाचक संज्ञा कहते हैं। जैसे- भीड़, मेला, सभा, कक्षा, परिवार, पुस्तकालय, झुंड, गिरोह, सेना, दल, गुच्छा, दल, टुकड़ी आदि। | क्रिकेट टीम ने वर्ल्ड कप जीता। |
| व्यक्तिवाचक |
किसी भी विशेष व्यक्ति, वस्तु या स्थान के नाम का बोध कराने वाली संज्ञा ही व्यक्तिवाचक संज्ञा कहलाती हैं। जैसे- महात्मा गाँधी, भगत सिंह, रमेश, रामायण, बाइबल, दिल्ली, मुंबई, लखनऊ आदि। |
मुंबई एक स्मार्ट सिटी बन गया है। |
| द्रव्यवाचक | जो शब्द किसी ठोस, तरल, पदार्थ, धातु, अधातु या द्रव्य का बोध करते हैं, द्रव्यवाचक संज्ञा कहलाते हैं। जैसे- कोयला, पानी, तेल, घी, लोहा, सोना, चांदी, हीरा, चीनी, फल, सब्ज़ी आदि द्रव्य हैं। |
मुझे पानी पीना है। |
Additional Informationसंज्ञा-
- किसी भी व्यक्ति, वस्तु, जाति, भाव या स्थान के नाम को संज्ञा कहते हैं।
- जैसे - मनुष्य (जाति), भारत (स्थान), बचपन (भाव), टेबल (वस्तु) आदि।
संज्ञा के भेद -
- व्यक्तिवाचक संज्ञा
- जातिवाचक संज्ञा
- भाववाचक संज्ञा
- समुदाय या समूहवाचक संज्ञा
- द्रव्यवाचक संज्ञा
शब्दकोश में सही शब्द - क्रम है - कंगन, कपड़ा, क्षत्रिय
- क वर्ग - कंगन, कपड़ा
- क वर्ग - क्षत्रिय ('क' वर्ण के बाद तथा 'ख' वर्ण से पहले)
- ‘क’ से प्रारंभ होने वाले शब्दो का क्रम -
- कं, क, का, कि, कि, की, कु, कू, कृ, के, कै, को, कौ, क् (आधा क) - क्या, क्रंद, क्रम आदि।
- प्रत्येक शब्द में प्रथम अक्षर के बाद आने वाले द्वितीय, तृतीय आदि अक्षरों का क्रम भी उपर्युक्त प्रकार से ही होगा।
Key Pointsशब्दकोश के अनुसार शब्दों का सही क्रम-
- मलिन, नलिनी, नीलम
- पंकज, पंच, पवन
- कागज, कुर्ता, कोचीन,
Important Pointsशब्दकोश में वर्णो के क्रम -
- अं, अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ, क, क्ष, ख, ग, घ, च, छ, ज, ज्ञ, झ,
- ट, ठ, ड, ढ, त, त्र, थ, द, ध, न, प, फ, ब, भ, म, य, र, ल, व, श, ष, स, ह।
बहुवचन शब्द है - 'प्राण'
- ‘प्राण’ शब्द का प्रयोग सदैव बहुवचन में किया जाता है
- कुछ शब्द सदैव बहुवचन में प्रयोग किये जाते है - दर्शन, आँसू, बाल, लोग, हस्ताक्षर आदि।
- एकवचन - पुस्तक, पौधा, लड़का
- कुछ शब्द सदैव एकवचन में प्रयोग किये जाते है - पानी, तेल, घी, दूध, आकाश, बारिश, जनता आदि।
Key Pointsबहुवचन:-
- शब्द के जिस रूप से वस्तु या व्यक्ति का एक से अधिक संख्या होने का बोध हो, बहुवचन कहलाते हैं।
- उदाहरण - कन्याएँ पढ़ रही हैं।
एकवचन:-
- शब्द के जिस रूप से वस्तु या व्यक्ति का एक संख्या होने का बोध हो, एकवचन कहलाते हैं।
- उदाहरण- नदी बह रही है।
Additional Information
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वचन:-
उदाहरण-
वचन दो प्रकार के होते हैं -
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शब्द तत्सम है- पाषाण
Key Points
- 'पाषाण' का तद्भव शब्द 'पाहन' है।
Additional Informationतत्सम शब्द-
- तत्सम शब्द वे होते हैं जिन्हें संस्कृत से ठीक वैसा ही लिया गया हो और हिंदी में किसी भी प्रकार के परिवर्तन के बिना प्रयोग किया जाता हो।
- इनका उच्चारण, व्याकरण और अर्थ, सब संस्कृत जैसा ही होता है।
- जैसे - विद्यालय, पुस्तकालय, राष्ट्रपति आदि।
तद्भव शब्द-
- तद्भव शब्द वे होते हैं जिन्हें संस्कृत से लिया गया हो, लेकिन उनमें ध्वनि, अर्थ, और व्याकरण में परिवर्तन किया गया हो।
अतिवृष्टि का विलोम: अल्पवृष्टि
- अतिवृष्टि = अति(अधिक) + वृष्टि(वर्षा) अर्थात अत्यधिक वर्षा
- बहुवृष्टि = बहु (बहुत) + वृष्टि(वर्षा) अर्थात बहुत वर्षा
- अर्थानुसार दोनों ही शब्द पर्यायवाची हैं इसलिए ये विलोम शब्द नहीं है।
Key Pointsअन्य विकल्प -
- असीम का अर्थ - असीमित, जिसकी सीमा न हो
- ससीम का अर्थ - सीमित, जिसकी सीमा हो
- ऐहिक का अर्थ - सांसारिक, भौतिक
- पारलौकिक का अर्थ - अलौकिक, जो लौकिक ना हो
- अतिथि का अर्थ - मेहमान, बाहर से आने वाला व्यक्ति
- आतिथेय का अर्थ - मेज़बान, जिसके वहाँ अतिथि रुका हो
Additional Information| शब्द | विलोम |
| पूर्णतः | अंशतः |
| ऋणात्मक | धनात्मक |
| ऐश्वर्य | अनैश्वर्य |
| भूगोल | खगोल |
| कुमार्ग | सुमार्ग |
| खीजना | रीझना |
| अन्तरंग | बहिरंग |
| केंद्रित | विकेन्द्रित |
| अवर | प्रवर |
| गण्य | नगण्य |
| आकर्षण | विकर्षण |
| गठियाना | खोलना |
| प्रतीची | प्राची |
| एकांगी | सर्वांगीण |
| गदर | शांति |
सूची I व सूची II से सही विलोम शब्द का एवं नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए :
|
सूची I |
सूची II |
||
|
A. |
आदि |
I. |
दुराचरण |
|
B. |
इहलोक |
II. |
अंत |
|
C. |
उत्कर्ष |
III. |
परलोक |
|
D. |
आचरण |
IV. |
अपकर्ष |
सही उत्तर है - A - II, B - III, C - IV, D - I
Key Pointsसूची I व सूची II से सही विलोम शब्द -
|
सूची I |
सूची II |
||
|
A. |
आदि |
II. |
अंत |
|
B. |
इहलोक |
III. |
परलोक |
|
C. |
उत्कर्ष |
IV. |
अपकर्ष |
|
D. |
आचरण |
I. |
दुराचरण |
Important Points
- विलोम - जो शब्द किसी एक शब्द के विपरीत अर्थ को व्यक्त करते हैं, वे विलोम शब्द कहलाते हैं।
Additional Informationकुछ अन्य विलोम शब्द-
| शब्द | विलोम |
| एकरंग | बहुरंग |
| उर्वर | ऊसर |
| ऋजुता | वक्रता |
| ऐच्छिक | अनैच्छिक |
| कठोर | कोमल |
| विस्मरण | कंठस्थ |
| गतिरोध | निर्विरोध |
| गृहीत | प्रदत्त |
| चातुर्य | सीधापन |
निम्नलिखित में से कौन-से शब्द स्वर संधि के उदाहरण हैं?
A. परमार्थ
B. कपीश
C. जगदीश
D. तल्लीन
E. रत्नाकर
नीचे दिए गए विकल्पों में से सबसे सही उत्तर चुनिए :
सही उत्तर है - केवल A, B, E
- आयोग द्वारा इस प्रश्न का सही उत्तर नहीं दिया गया है जिसे हमारे द्वारा विकल्प में आवश्यकतानुसार परिवर्तन कर सही दिया गया है।
Key Pointsस्वर संधि के उदाहरण हैं-
- A.'परमार्थ' का संधि विच्छेद है- परम + अर्थ (अ + अ = आ); इसमें दीर्घ स्वर संधि है।
- B.'कपीश' शब्द का संधि-विच्छेद- 'कपि + ईश' (इ + ई = ई) होता है, यह दीर्घ स्वर संधि का उदाहरण है।
- E.'रत्नाकर' शब्द का संधि विच्छेद 'रत्न + आकर' (अ + आ = आ) होता है, इसमें दीर्घ स्वर संधि है।
अन्य विकल्प -
- 'जगदीश' शब्द का संधि-विच्छेद - 'जगत + ईश' (त् + ई = दी) होता है, इसमें व्यंजन संधि है।
- 'तल्लीन' शब्द का संधि विच्छेद - 'तत् + लीन' होता है, इसमें व्यंजन संधि है।
Important Points
- स्वर संधि- दो स्वरों के मेल से उत्पन्न होने वाले विकार को स्वर संधि कहते हैं।
- जैसे - धर्म + आत्मा = धर्मात्मा (अ + आ = आ)।
- इसके इसके पाँच भेद हैं- दीर्घ, गुण, वृद्धि, यण, अयादि।
Additional Information
| संधि | परिभाषा | उदाहरण |
| दीर्घ | जब दो शब्दों की संधि करते समय (अ, आ) के साथ (अ, आ) हो तो ‘आ‘ बनता है, जब (इ, ई) के साथ (इ, ई) हो तो ‘ई‘ बनता है, जब (उ, ऊ) के साथ (उ, ऊ) हो तो ‘ऊ‘ बनता है, तो उसे दीर्घ संधि कहते है। |
विद्या + अभ्यास = विद्याभ्यास (आ + अ = आ) कवि + ईश्वर = कवीश्वर (इ + ई = ई) वधु + उत्सव = वधूत्सव (उ + उ = ऊ) |
| व्यंजन | जब संधि करते समय व्यंजन के साथ स्वर या कोई व्यंजन के मिलने से जो रूप में परिवर्तन होता है, उसे ही व्यंजन संधि कहते हैं। |
उत् + शिष्ट = उच्छिष्ट वाक् + ईश = वागीश |
निम्नलिखित वाक्य में किन-किन विराम चिह्नों का प्रयोग हुआ है ?
मित्र ! एक अच्छा दिन साथ बिताने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद ।
A. विस्मयादिबोधक विराम चिह्न
B. अल्प विराम
C पूर्ण विराम
D. हंस पद
E. योजक चिह्न
नीचे दिए गए विकल्पों में से सबसे सही उत्तर चुनिए :
सही उत्तर है - केवल A, C, E
Key Points
- मित्र ! एक अच्छा दिन साथ बिताने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।
- A. विस्मयादिबोधक विराम चिह्न
- C पूर्ण विराम
- E. योजक चिह्न
Important Points
|
विस्मयादिबोधक चिह्न-
जैसे-
योजक चिह्न-
जैसे-
पूर्ण विराम चिह्न -
जैसे-
अल्पविरामचिह्न-
जैसे-
हंसपद चिह्न-
जैसे-
|
Additional Information
विराम चिह्न के प्रकार -
| विराम चिह्न का नाम | विराम चिह्न |
| पूर्ण विराम | (।) |
| अर्द्ध विराम | (;) |
| अल्प विराम | (,) |
| उप विराम | (:) |
| प्रश्नवाचक चिह्न | (?) |
| योजक चिह्न | (–) |
| कोष्ठक चिह्न | () |
| अवतरण या उदहारणचिह्न | ( “…” ) |
| विस्मयादिबोदक चिह्न | [ ! ] |
| लाघव चिन्ह/ संक्षेपसूचक | (०) |
| निर्देशक चिह्न | [ — ] |
| विवरण चिह्न | ( :- ) |
| विस्मरण चिह्न या त्रुटिपूरक चिह्न/हंसपद | (^) |
निम्नलिखित सूची-I की लोकोक्तिओं को सूची-II में उनके अर्थ के साथ सुमेलित कीजिए -
| सूची-I | सूची-II | ||
| (a) | गंगा गए गंगादास, जमुना गए जमुनादास | (1) | व्यर्थ में दखल देने वाला |
| (b) | दाल भात में मूसलचंद | (2) | जिसका कोई दृढ़ सिद्धांत नहीं |
| (c) | पहले भीतर तब देवता-पितर | (3) | अच्छे-बुरे सबको एक समझना |
| (d) | सब धान बाईस पसेरी | (4) | पेट पूजा सबसे प्रधान |
सही उत्तर है - (a) - 2, (b) - 1, (c) - 4, (d) - 3
- सूची-l में लोकोक्तियाँ दी गई हैं और सूची-ll में लोकोक्तियों के अर्थ दिए गए हैं।
- लोक + उक्ति = लोकोक्ति
- समाज में प्रचलित उक्ति(कथन) को ही लोकोक्ति कहते हैं।
Key Pointsउपर्युक्त सूची के लिए सही जोड़ी निम्नलिखित है -
| सूची-I | सूची-II | |
| लोकोक्तियाँ | अर्थ | वाक्य प्रयोग |
| गंगा गए गंगादास, जमुना गए जमुनादास | जिसका कोई दृढ़ सिद्धांत नहीं | नेता राजनीति में कभी किसी दल में तो कभी अन्य दल में चले जाते हैं उनकी हालत गंगा गए गंगादास, जमुना गए जमुनादास जैसी है। |
| दाल भात में मूसलचंद | व्यर्थ में दखल देने वाला | लीला सैर सपाटे के लिए जा रही थी तभी उसके मामा आ गए ये तो ऐसा हुआ जैसे दाल भात में मुसलचंद। |
| पहले भीतर तब देवता-पितर | पेट पूजा सबसे प्रधान | घर में घुसते ही श्याम को काम सौंप दिया गया पर श्याम ने साफ-साफ कह दिया कि पहले भीतर तब देवता पितर। |
| सब धान बाईस पसेरी | अच्छे-बुरे सबको एक समझना | आरती के लिए सारे खाद्य प्रदार्थ सब धान बाईस पसेरी जैसा है। |
- इस प्रकार सही मिलान (a) - 2, (b) - 1, (c) - 4, (d) - 3 होगा।
'अरे ! जरा इधर तो आ' में से अव्यय है- विस्मयादिबोधक
Key Points
- 'अरे ! जरा इधर तो आ' अव्यय शब्द : (अरे! इस वाक्य में विस्मयादिबोधक चिन्ह (!) लगेगा।)
- जिन अव्यय शब्दों से हर्ष, शोक, विस्मय, ग्लानी, लज्जा, घर्णा, दुःख, आश्चर्य आदि के भाव का पता चलता है, उन्हें विस्मयादिबोधक अव्यय कहते हैं।
- जहाँ पर अरे!, हाय!, शबाश!, ओह!, वाह!, हाँ!, वाह!, हैं!, ऐ!, क्या!, ओहो, अहा!, उफ, हा-हा!आदि आते हैं।
- जैसे - अरे! तुम यहाँ कैसे?
Additional Information
|
प्रश्नवाचक:-
जैसे -
कालवाचक -
जैसे -
परिमाणवाचक:-
जैसे-
|
निम्नलिखित सूची-I के मुहावरों को सूची-II में उनके अर्थ के साथ सुमेलित कीजिए -
| सूची-I | सूची-II | ||
| (A) | आंख का नीर ढल जाना | (1) | अनुभवहीन व्यक्ति |
| (B) | अंडे का शहजादा | (2) | व्यर्थ की लिखा पढ़ी करना |
| (C) | निन्यानवे के फेर में पड़ना | (3) | निर्लज्ज हो जाना |
| (D) | कागज़ी घोड़े दौड़ाना | (4) | धन कमाने में लगे रहना |
सही उत्तर है - (A) - 3, (B) - 1, (C) - 4, (D) - 2
- सूची-l में मुहावरे दिए गए हैं और सूची-ll में मुहावरो के अर्थ दिए गए हैं।
- मुहावरा संक्षिप्त होता है, परन्तु अपने इस संक्षिप्त रूप में मुहावरा किसी बड़े विचार या भाव को प्रकट करता है।
Key Pointsउपर्युक्त सूची के लिए सही जोड़ी निम्नलिखित है -
| सूची-I | सूची-II | |
| मुहावरे | अर्थ | वाक्य प्रयोग |
| आंख का नीर ढल जाना | निर्लज्ज हो जाना | संदीप के आँखों का पानी ढल गया है इसीलिए वह सबके सामने भद्दे मजाक करता है। |
| अंडे का शहजादा | अनुभवहीन व्यक्ति | तुम्हे यहाँ काम करते हुए कितने वर्ष बित गए हैं और तुम ऐसी बात कर रहे हो जैसे अंडे का शाहजादा। |
| निन्यानवे के फेर में पड़ना | धन कमाने में लगे रहना | तुम निन्यानवे के फेर में मत पड़ो जितना है उसी में खुश रहना सीखो वरना सदैव अप्रसन्न रहोगे। |
| कागज़ी घोड़े दौड़ाना | व्यर्थ की लिखा पढ़ी करना | शंकर का बेटा बिजनेस के नाम पर कागज़ी घोड़े दौड़ाता रहता है लेकिन असल में उसे देखा जाए तो वह कोई कार्य नहीं करता है। |
इस प्रकार सही सुमिलन (A) - 3, (B) - 1, (C) - 4, (D) - 2 होगा।
दिए गए विकल्पों में से "दृष्टान्त" छंद - प्रकार नहीं है।
Key Points
- चौपाई, दोहा,सोरठा,हरिगीतिका , आल्हा, बरवै, रोला,
- उल्लाला,कुंडलिया,छप्पय, अहीर इत्यादि छंद के प्रकार है।
Important Points
- अक्षर, अक्षरों की संख्या, मात्रा, गणना, यति, गति को क्रमबद्ध तरीके से लिखना छंद कहलाती हैं।
- जैसे - चौपाई, दोहा, शायरी इत्यादि। छंद शब्द ‘चद’ धातु से बना है जिसका अर्थ होता है – खुश करना।
- छंद में पहले चार चरण हुआ करते हैं। तुक छंद की आत्मा होती है- यही हमारी आनंद-भावना को प्रेरित करती है।
- छंद के अंग - चरण/पद, वर्ण और मात्राएँ, गति, यति, तुक, गण,
- वर्ण और मात्रा के विचार से छन्द के चार भेद है- मात्रिक छंद, वर्णिक छंद, वर्णिक वृत छंद, मुक्तछन्द।
Additional Information वर्णिक छन्द-
- जिन छंदों में वर्णों की संख्या, क्रम, गणविधान तथा लघु-गुरु के आधार पर,
- पदरचना होती है, उन्हें 'वर्णिक छंद' कहते हैं।
- वार्णिक छन्द के दो भेद है- (i) साधारण और (ii) दण्डक
- 1 से 26 वर्ण तक के चरण या पाद रखनेवाले वार्णिक छन्द 'साधारण' होते है और इससे अधिकवाले दण्डक।
| प्रमुख वर्णिक छंद : (1) इंद्रवज्रा (2) उपेन्द्रवज्रा (3) तोटक (4) वंशस्थ (5) द्रुतविलंबित (6) भुजंगप्रयात (7) वसंततिलका (8) मालिनी (9) मंदाक्रांता (10) शिखरिणी (11) शार्दूलविक्रीडित (12) सवैया (13) कवित्त |
वार्णिक वृत्त-
- वृत्त उस समछन्द को कहते है, जिसमें चार समान चरण होते है और प्रत्येक चरण में आनेवाले वर्णों का लघु-गुरु-क्रम सुनिश्र्चित रहता है।
- गणों में वर्णों का बँधा होना प्रमुख लक्षण होने के कारण इसे वार्णिक वृत्त, गणबद्ध या गणात्मक छन्द भी कहते हैं।
- 7 भगण और 2 गुरु का 'मत्तगयन्द सवैया' इसके उदाहरण स्वरूप है-
- भगण भगण भगण भगण
- ऽ।। ऽ।। ऽ।। ऽ।।
- या लकुटी अरु कामरि या पर
- भगण भगण भगण गग
- ऽ।। ऽ।। ऽ।। ऽऽ
- राज तिहूँ पुर को तजि डारौं - कुल 7 भगण +2 गुरु=23 वर्ण,
- 'द्रुतविलम्बित' और 'मालिनी' आदि गणबद्ध छन्द 'वार्णिक वृत्त' है।
मात्रिक छन्द-
- जिन छंदों में मात्राओं की संख्या, लघु-गुरु, यति-गति के आधार पर पदरचना होती है, उन्हें मात्रिक छन्द कहते हैं।
प्रमुख मात्रिक छंद-
|
प्रमुख मात्रिक छंद- चौपाई, दोहा,सोरठा,हरिगीतिका , आल्हा, बरवै, रोला,उल्लाला,कुंडलिया,छप्पय, अहीर |
मुक्तछन्द-
- जिस समय छंद में वर्णिक या मात्रिक प्रतिबंध न हो, न प्रत्येक चरण में वर्णो की संख्या और क्रम समान हो
- और मात्राओं की कोई निश्चित व्यवस्था हो तथा जिसमें नाद और ताल के आधार पर
- पंक्तियों में लय लाकर उन्हें गतिशील करने का आग्रह हो, वह मुक्त छंद है।
उदाहरण- निराला की कविता 'जूही की कली' इत्यादि।
सूची I व सूची II से पर्यायवाची शब्दों का मिलान एवं नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए :
|
सूची I |
सूची II |
||
|
A. |
आग |
I. |
पिक |
|
B. |
पत्थर |
II. |
भागीरथी |
|
C. |
कोयल |
III. |
अनल |
|
D. |
गंगा |
IV. |
पाषाण |
सही उत्तर है - A - III, B - IV, C - I, D - II
Key Pointsसूची I व सूची II से पर्यायवाची शब्दों का मिलान -
|
सूची I |
सूची II |
||
|
A. |
आग |
III. |
अनल |
|
B. |
पत्थर |
IV. |
पाषाण |
|
C. |
कोयल |
I. |
पिक |
|
D. |
गंगा |
II. |
भागीरथी |
Important Points
- पर्यायवाची - ऐसे शब्द जिनके अर्थ समान हों, पर्यायवाची शब्द कहलाते हैं।
| शब्द | अन्य पर्यायवाची शब्द |
| आग | अग्नि, पावक, दहन, ज्वलन, धूमकेतु, हुताशन, वैश्वानर, शुचि, ज्वाला। |
| पत्थर | पाहन, उपल, प्रस्तर, शिला, चट्टान। |
| कोयल | कोकिला, काकपाली, बसंतदूत, श्यामा, सारिका, कुहुकिनी, वनप्रिया, मदनश्लाका, परमृत। |
| गंगा | देवनदी, भागीरथी, मंदाकिनी, देवपगा, सुरसरिता, विष्णुपदी, स्वर्गापगा, त्रिपथंगा। |
Additional Informationकुछ महत्वपूर्ण पर्यायवाची शब्द -
| शब्द | पर्यायवाची शब्द |
| चिड़िया | पखेरू, विहंग, खग, पंछी, परिन्दा, अण्डज, खेचर। |
| घर | गृह, सदन, आवास, आलय, गेह, निवास, निलय, मंदिर। |
| सूर्य | भानु, भास्कर, आक, आदित्य, दिनेश, मित्र, पतंग। |
| चोर | तस्कर, दस्यु, रजनीचर, मोषक, कुंभिल, खनक। |
| वृक्ष | तरु, द्रुम, पादप, विटप, अगम, पेड़, गाछ। |
| किरण | मरीचि, मयूख, अंशु, कर, रश्मि, प्रभा, अर्चि, गो। |
| सिंह | शेर, वनराज, शार्दूल, मृगराज, व्याघ्र, मृगेंद्र, महावीर। |
अर्थालंकार नहीं है - यमक अलंकार
Key Points
- 'यमक' अलंकार शब्दालंकार का भेद है।
- जब कुछ विशेष शब्दों के कारण काव्य में चमत्कार पैदा होता है, वहाँ शब्दालंकार होता है।
- शब्दालंकार के मुख्यतः 6 प्रकार होते हैं-
- अनुप्रास अलंकार; यमक अलंकार; पुनरुक्ति अलंकार; विप्सा अलंकार; वक्रोक्ति अलंकार; श्लेष अलंकार।
यमक अलंकार-
- जब एक ही शब्द ज्यादा बार प्रयोग हो, पर हर बार अर्थ अलग-अलग आये वहाँ पर यमक अलंकार होता है।\
- उदाहरण -
- तीन बेर खाती थी वे तीन बेर खाती हैं।
- (इस पंक्ति में 'बेर' शब्द का दो बार प्रयोग हुआ है।
- पहली बार 'तीन बेर' दिन में तीन बार खाने की तरफ संकेत कर रहा है तथा दूसरी बार 'तीन बेर' का अर्थ है - तीन फल।)
Important Pointsअर्थालंकार-
- अर्थालंकार की निर्भरता शब्द पर न होकर शब्द के अर्थ पर आधारित होती है।
- अर्थालंकार के मुख्य रूप से पांच प्रकार होते हैं:
- उपमा अलंकार
- रूपक अलंकार
- उत्प्रेक्षा अलंकार
- अतिशयोक्ति अलंकार
- मानवीकरण अलंकार
Additional Information
|
उपमा:-
उदाहरण -
रूपक:-
उदाहरण -
उत्प्रेक्षा:-
उदाहरण-
अतिशयोक्ति:-
उदाहरण-
मानवीकरण:-
उदाहरण-
|
'विधुर' का स्त्रीलिंग है - विधवा
Key Points
- 'विधुर' (अर्थ: वह पुरुष जिसकी स्त्री मर गई हो।) एक पुल्लिंग शब्द है जिसका स्त्रीलिंग शब्द 'विधवा' (अर्थ: वह स्त्री जिसका पति मर गया हो) होता है।
- स्त्रीलिंग - शब्द के जिस रूप से व्यक्ति या वस्तु की स्त्री जाति का बोध होता है, उसे स्त्रीलिंग कहते हैं।
- जैसे - माता, लड़की, भेड़, गाय, बंदरिया, मछली, बुढ़िया, शेरनी, नारी, रानी, राजकुमारी, बहन, घास, खिड़की आदि।
- पुल्लिंग - शब्द के जिस रूप से पुरुष जाति का बोध होता है, उसे पुल्लिंग कहते हैं।
- जैसे- बकरा, घोड़ा, लड़का, आदमी, शेर, हाथी, भेड़िया, खटमल, बन्दर, बालक, शिशु, पत्रकार, राजा, राजकुमार आदि।
अन्य विकल्प-
- 'विधुरी, विधुराइन, विधुरनी' शब्द वर्तनी सम्बन्धित त्रुटि है।
Important Points
| पुल्लिंग | स्त्रीलिंग |
| कवि | कवयित्री |
| इंद्र | इंद्राणी |
| तपस्वी | तपस्विनी |
| दर्शक | दर्शिका |
| प्रियतम | प्रियतमा |
| बुद्धिमान | बुद्धिमती |
| रचयिता | रचयित्री |
| पंडित | पंडिताइन |
Additional Information लिंग दो प्रकार के होते हैं-
- पुल्लिंग
- स्त्रीलिंग
दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर ‘अनुशासित’ है। अन्य विकल्प इसके गलत उत्तर हैं।
Key Points
- दिए गए विकल्पों में से 'अनुशासन' शब्द का उचित विशेषण शब्द 'अनुशासित' होगा।
- स्वतंत्र रूप से विशेषणों की संख्या कम है।
- आवश्यकतानुसार संज्ञा से ही विशेषण शब्दों को बनाया जाता है।
- संज्ञा शब्दों में प्रत्यय के योग से भी विशेषण शब्दों का निर्माण किया जाता है।
- उपसर्ग के योग से भी विशेषण शब्द बनाए जाते हैं।
Additional Information
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विशेषण- जो शब्द संज्ञा या सर्वनाम शब्दों की विशेषता बताते हैं। इसके मुख्यतः आठ भेद हैं - |
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निम्नलिखित शब्दों पर विचार कीजिए:
1. अधोगती
2. अध्यापीका
3. साहित्यकार
4. तिमिर
किस विकल्प में सभी शब्द शुद्ध हैं ?
सही उत्तर है - 3 और 4
Key Points
- शुद्ध शब्द - 'साहित्यकार, तिमिर'
- 'साहित्यकार' का अर्थ - साहित्य की रचना करनेवाला।
- 'तिमिर' का अर्थ - अंधकार, अँधेरा।
- वर्तनी - भाषा के किसी शब्द को को लिखने में प्रयुक्त वर्णों के सही क्रम को वर्तनी कहते हैं।
अन्य विकल्प -
| अशुद्ध | शुद्ध |
| अधोगती | अधोगति |
| अध्यापीका | अध्यापिका |
Additional Information
| अशुद्ध | शुद्ध |
| अग्नेय | आग्नेय |
| सिंगार | शृंगार |
| अकांक्षा | आकांक्षा |
| संसारिक | सांसारिक |
| उपरोक्त | उपर्युक्त |
| प्रतिनिधी | प्रतिनिधि |
| निरोग | नीरोग |
| दुरावस्था | दुरवस्था |
| पुर्नजन्म | पुनर्जन्म |
Key Points
- 'जिसके पार देखा न जा सके - पारदर्शक' - अनेक शब्दों के लिए एक शब्द का जोड़ा सुमेलित नहीं है l
- जिसके पार देखा न जा सके वाक्यांश के लिए एक शब्द है - अपारदर्शी/अपारदर्शकl
- पारदर्शक का अर्थ है -
- जिसके पार देखा जा सके l
- अन्य विकल्प :-
- अन्य सभी वाक्यांश और उनके लिए एक शब्द सुमेलित जोड़ों के उदाहरण है l
Additional Information
- जब किसी वाक्य में प्रयुक्त या स्वतन्त्र, किसी वाक्यांश के लिए किसी एक शब्द का प्रयोग किया जाता है, जो उस वाक्यांश के अर्थ को पूरी तरह सिद्ध करता हो तो उसे वाक्यांश के लिए एक शब्द कहते हैं, अर्थात अनेक शब्दों के लिए एक शब्द को प्रयुक्त करना ही वाक्यांश के लिए एक शब्द कहलाता है l
- वाक्यांश के लिए एक शब्द के उदाहरण:-
- जिस ने हमला किया हो - आक्रान्ता
- जिसे सूँघा जा सके - आघ्रेय
- किसी स्थान के सर्वाधिक पुराने निवासी - आदिवासी
इसका सही उत्तर विकल्प 1 ‘जिस शब्द की विशेषता बताई जाती है’ होगा। अन्य विकल्प सही उत्तर नहीं हैं।

- विशेष्य वह शब्द होता है जिस शब्द की विशेषता बताई जाती है।

|
विशेषण |
परिभाषा |
उदाहरण |
|
विशेषण |
विशेषण वे शब्द होते हैं जो संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताते हैं। ये शब्द वाक्य में संज्ञा के साथ लगकर संज्ञा की विशेषता बताते हैं। |
बड़ा, काला, लम्बा, दयालु, भारी, सुंदर आदि। |
|
विशेष्य |
विशेषण जिस शब्द संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताता है। उसे विशेष्य कहते है। |
‘आम का रंग पीला’ उक्त उदहारण में ‘आम ‘विशेष्य है। |
व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध वाक्य है - भोपाल में अनेक तालाब हैं।
- शुद्ध वाक्य - भोपाल में अनेक तालाब हैं।
- इस वाक्य में संज्ञा, सर्वनाम, कारक व वचन का सही पदक्रम में प्रयोग किया गया है इसलिए यह वाक्य व्याकरणिक रूप से शुद्ध है।
Key Pointsअन्य विकल्प -
- माता जी का मन गद्गद हो गया। (वर्तनी संबंधी अशुद्धि)
- माता जी का मन गदगद हो गया।
- समय के साथ शब्द लोप हो जाते हैं।(वचन संबंधी अशुद्धि)
- समय के साथ शब्दों का लोप हो जाता है। (जब वचन में परिवर्तन होता है तब क्रिया पर भी उसका प्रभाव पड़ता है।)
- वह बड़ा अच्छा खिलाड़ी है। (पुनरावृत्ति की अशुद्धियाँ)
- वह अच्छा खिलाड़ी है। या शुद्ध: वह उत्कृष्ट खिलाड़ी है।
Additional Information
- वाक्य भाषा की महत्त्वपूर्ण इकाई है।
- वाक्य में व्याकरण के अनुसार पदों का क्रमबद्ध होना बहुत अधिक आवश्यक है अन्यथा वाक्य का अर्थ भी बदल सकता है।
- वाक्य को बोलते व लिखते समय उसकी शुद्धता, स्पष्टता और सार्थकता का ध्यान रखना आवश्यक है।
- वाक्य में क्रिया, कर्ता, लिंग, वचन, वर्तनी, विशेषण इत्यादि अशुद्धियाँ हो सकती हैं।
पत्र जिस व्यक्ति को लिखा जाता है, उसे कहा जाता है- प्रेषिती अन्य सभी विकल्प असंगत है।
Key Points
- पत्र जिस व्यक्ति को लिखा जाता है, उसे प्रेषिती कहा जाता है।
Important Points
| शब्द | अर्थ |
| प्रेषक |
वह व्यक्ति जो किसी के पास कोई संदेश या वस्तु भेजे |
| प्रेक्षक | वह व्यक्ति जो किसी वस्तु, व्यक्ति, काम या बात को विशेष उद्देश्य से बहुत ध्यानपूर्वक देखता रहता हो। |
| प्रेषण | किसी चीज़ को भेजने की क्रिया |
Additional Informationपत्र:-
- चिट्ठी या खत किसी कागज या अन्य माध्यम पर लिखे सन्देश को कहते हैं।
- उन्नीसवीं एवं बीसवीं शताब्दियों में पत्र ही दो व्यक्तियों के बीच संचार का सबसे विश्वसनीय माध्यम था।
- किन्तु अब टेलीफोन, सेलफोन एवं अन्तरजाल के युग में इसकी भूमिका काफी कम हो गयी है।
- पत्रों का हमारे जीवन में एक महत्वपूर्ण स्थान है। पत्र संचार का एक सुगम साधन है।
इनमें से "निष्कलंक - निष" उपसर्ग सुमेलित नहीं है।
Key Points
- "निष्कलंक - निष" उपसर्ग सुमेलित नहीं है।
- 'निष्कलंक' शब्द 'निस्' उपसर्ग से बना है।
- 'निष्कलंक' से तात्पर्य है 'निस्+कलंक' या 'निः+कलंक'।
- अन्य विकल्प में उचित उपसर्ग का प्रयोग हुआ है।
अन्य उपसर्ग से बने शब्द-
| उपसर्ग | शब्द |
| निर् | निर्वाह,निर्बल। |
| परि | पर्यावरण,परिमाप। |
| अनु | अनुगामी, अनुशरण। |
| अधि | अधिकार, अधिपति। |
| अभि | अभिलाषा, अभिमान। |
Additional Information
| प्रकार | परिभाषा | उदाहरण |
| उपसर्ग | वह अव्यय जो शब्द के पहले लगकर शब्द का अर्थ बदल दे। | अभि + हार = अभिहार। |
निम्नलिखित शब्दों पर विचार कीजिए:
1. तेलांजली
2. विभिषिका
3. विस्मरण
4. हितैषी
किस विकल्प में सभी शब्द शुद्ध हैं?
सही उत्तर हैं - 3 और 4
Key Points
- शुद्ध शब्द - 'विस्मरण, हितैषी'
-
'विस्मरण' का अर्थ - स्मरण न रहना या भूल जाना।
-
'हितैषी' का अर्थ - कल्याण मनानेवाला।
-
अन्य विकल्प -
- अशुद्ध शब्द - 'तेलांजली', शुद्ध शब्द - 'तिलांजली'
- 'तिलांजली' का अर्थ - मृतक संस्कार का एक अंग।
- अशुद्ध शब्द - विभिषिका, शुद्ध शब्द - 'विभीषिका'
- 'विभीषिका' का अर्थ - त्रास, भय या डर दिखाना, आतंक।
- वर्तनी - भाषा के किसी शब्द को को लिखने में प्रयुक्त वर्णों के सही क्रम को वर्तनी कहते हैं।
Important Points
| अशुद्ध | शुद्ध |
| परिछेद | परिच्छेद |
| मृत्युन्जय | मृत्युञ्जय |
| प्रदर्शिनी | प्रदर्शनी |
| स्वालंबी | स्वावलंबी |
| काराग्रह | कारागृह |
| उहापोह | ऊहापोह |
| अनुगृह | अनुग्रह |
| प्रणीवृन्द | प्राणिवृंद |
| मान्यनीय | माननीय |
सूची I के रेखांकित पदों के लिए सूची II से सर्वनाम के उपयुक्त भेद चुनिए एवं नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए :
|
सूची I |
सूची II |
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A. |
मेरे साथ कौन चलेगा ? |
I. |
निश्चयवाचक सर्वनाम |
|
B. |
मैं स्वयं चला जाऊँगा |
II. |
प्रश्नवाचक सर्वनाम |
|
C. |
मैं घर जा रहा हूँ। |
III. |
निजवाचक सर्वनाम |
|
D. |
वह शीला का घर है । |
IV. |
पुरुषवाचक सर्वनाम |
सही उत्तर है - A - II, B - III, C - IV, D - I
Key Pointsसूची I के रेखांकित पदों के लिए सूची II से सर्वनाम के उपयुक्त भेद -
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सूची I |
सूची II |
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A. |
मेरे साथ कौन चलेगा ? |
II. |
प्रश्नवाचक सर्वनाम |
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B. |
मैं स्वयं चला जाऊँगा |
III. |
निजवाचक सर्वनाम |
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C. |
मैं घर जा रहा हूँ। |
IV. |
पुरुषवाचक सर्वनाम |
|
D. |
वह शीला का घर है । |
I. |
निश्चयवाचक सर्वनाम |
Important Pointsसर्वनाम के छ: भेद होते हैं -
- पुरुषवाचक सर्वनाम
- निश्चयवाचक सर्वनाम
- अनिश्चयवाचक सर्वनाम
- सम्बन्धवाचक सर्वनाम
- प्रश्नवाचक सर्वनाम
- निजवाचक सर्वनाम।
Additional Information
| सर्वनाम | परिभाषा | उदाहरण |
| पुरुषवाचक | ये सर्वनाम व्यक्तिगत रूप से किसी व्यक्ति, जीव, जानवर, वस्तु, स्थान या विचार के संदर्भ में प्रयोग होते हैं। इसके सर्वनाम के अंतर्गत मैं, हम, तू, तुम, तुम्हारा, तुम्हारी, वह, वे, उसका, उसकी, उनका, उनकी, आदि। |
तुम कहाँ गए थे? |
| निश्चयवाचक | जिन सर्वनाम शब्दों से किसी वस्तु, व्यक्ति या स्थान की निश्चितता का बोध हो वे शब्द निश्चयवाचक सर्वनाम कहलाते हैं। इस सर्वनाम के अंतर्गत ‘यह’ और ‘वह’ आते हैं। |
वह मेरी पैन है। |
| अनिश्चयवाचक |
जिन सर्वनाम शब्दों से वस्तु, व्यक्ति, स्थान आदि की निश्चितता का बोध नही होता, वे अनिश्चयवाचक सर्वनाम कहलाते हैं। इसके सर्वनाम के अंतर्गत ‘कोई’ और ‘कुछ’ आते हैं। |
भोजन में कुछ गिर गया है। |
| संबंधवाचक |
जिस सर्वनाम से वाक्य में किसी दूसरे सर्वनाम से संबंध स्थापित किया जाए, उसे संबंधवाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे - जैसी, तैसी, वैसी, जैसा, वैसा, जो, सो, जहाँ, वहाँ, जिसकी, उसकी, जितना, उतना आदि। |
जिसकी लाठी, उसकी भैंस। |
| प्रश्नवाचक | जिन शब्दों का प्रयोग किसी वस्तु, व्यक्ति आदि के बारे में कोई सवाल पूछने या उसके बारे में जाने के लिए किया जाता है, उन शब्दों को प्रश्नवाचक सर्वनाम कहते हैं। प्रश्नवाचक सर्वनाम के अंतर्गत कौन, क्या, कहाँ आदि शब्द आते हैं। | तुम क्या खा रहे हो? |
| निजवाचक | जिन शब्दों का प्रयोग वक्ता स्वयं के लिए करता है, वे निजवाचक सर्वनाम कहलाते हैं। इसके अंतर्गत आप, स्वयं, खुद, स्वतः आदि। | मैं अपनी गाड़ी से जाऊंगा। |
'वह घर से बाहर गया' - इस वाक्य में 'से' कारक है - अपादान
Key Points
- वाक्य - वह घर से बाहर गया (वाक्य में घर से बाहर (अलगाव) की बात की जा रही है।)
- यहाँ से विभक्ति चिन्ह का प्रयोग किया जा रहा है, अतः यह उदाहरण अपादान कारक के अंतर्गत आएगा।
- जब संज्ञा या सर्वनाम के किसी रूप से किन्हीं दो वस्तुओं के अलग होने का बोध होता है, तब वहां अपादान कारक होता है।
- अपादान कारक का भी विभक्ति चिन्ह से होता है।
- उदाहरण - आसमान से बूँदें गिरी। हिमालय से गंगा निकलती है।
Confusion Pointsकरण और अपादान कारक में अंतर:-
- करण और अपादान दोनों ही कारकों में ‘से’ चिन्ह का प्रयोग होता है।
- परन्तु अर्थ के आधार पर दोनों में अंतर होता है।
- करण कारक में जहाँ पर ‘से’ का प्रयोग साधन के लिए होता है
- वहीं पर अपादान कारक में अलग होने के लिए किया जाता है।
Important Pointsहिन्दी में आठ कारक’ हैं -
| कारक | विभक्तियाँ |
| कर्ता | ने |
| कर्म | को |
| करण | से, द्वारा |
| सम्प्रदान | को, के लिये, हेतु |
| अपादान | से (अलग होने के अर्थ में) |
| सम्बन्ध | का, की, के, रा, री, रे |
| अधिकरण | में, पर |
| सम्बोधन | हे! अरे! ऐ! ओ! हाय! |
Additional Information
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कर्ता कारक:-
उदाहरण -
कर्म कारक:-
उदाहरण -
करण कारक:-
उदाहरण -
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वाक्य में 'अकर्मक क्रिया' का प्रयोग किया गया है - बालक बहुत देर से रो रहा है।
Key Points
- वाक्य - बालक बहुत देर से रो रहा है।
- (वाक्य में कर्म का अभाव है तथा 'रोना' (क्रिया) का प्रभाव 'बालक' (कर्ता) पर पड़ रहा है, अत: यह अकर्मक क्रिया उदाहरण है।)
- जिस क्रिया में कार्य का फल कर्ता पर ही पड़े, उसे अकर्मक क्रिया कहते हैं।अकर्मक क्रिया में कर्म नहीं पाया जाता है।
- जैसे - वह बहुत तेज दौड़ता है। आकाश दिन भर खेलता रहता है।
अन्य विकल्प -
- मज़दूर चाय पी रहा है।
- अम्मा खाना बना रही है।
- रमेश पुस्तक पढ़ रहा है।
- (वाक्यों में 'पीना, बनाना, पढ़ना' क्रियाओं का प्रभाव क्रमशः 'मज़दूर, अम्मा,
- रमेश' पर न पड़कर 'चाय, खाना, पुस्तक' पर पड़ रहा है।
- 'चाय, खाना, पुस्तक' कर्म हैं। ये सभी सकर्मक क्रिया के उदाहरण हैं।)
Important Points क्रिया के भेद -
- कर्म के आधार पर क्रिया के दो भेद होते हैं।
- सकर्मक क्रिया
- अकर्मक क्रिया
Additional Information
| क्रिया | परिभाषा | उदाहरण |
| सकर्मक |
जिन क्रियाओं के कार्य का फल कर्ता को छोड़कर कर्म पर पड़ता है उन्हे सकर्मक क्रिया कहते है।सकर्मक क्रिया कर्म के बिना अपना भाव पूर्ण रूप से प्रकट नहीं कर पाती। |
सचिन फुटबॉल मैच खेलता है। |
असंगत युग्म है : सेठ - सिठानी
Key Points
- 'सेठ' शब्द का स्त्रीलिंग रूप 'सेठानी' होता है।
- स्त्रीलिंग - शब्द के जिस रूप से व्यक्ति या वस्तु की स्त्री जाति का बोध होता है, उसे स्त्रीलिंग कहते हैं।
- जैसे - माता, लड़की, भेड़, गाय, बंदरिया, मछली, बुढ़िया, शेरनी, नारी, रानी, राजकुमारी, बहन आदि।
- पुल्लिंग - शब्द के जिस रूप से पुरुष जाति का बोध होता है, उसे पुल्लिंग कहते हैं।
- जैसे- बकरा, घोड़ा, लड़का, आदमी, शेर, हाथी, भेड़िया, बन्दर, बालक, शिशु, राजा, राजकुमार आदि।
अन्य विकल्प-
| पुल्लिंग | स्त्रीलिंग |
| ठाकुर | ठकुराइन |
| लाला | ललाइन |
| बनिया | बनियाइन |
Important Points
| पुल्लिंग | स्त्रीलिंग |
| कवि | कवयित्री |
| संपादक | संपादिका |
| मालिक | मालकिन |
| बंजारा | बंजारिन |
| निर्माता | निर्मात्री |
| पंडित | पंडिताइन |
| क्षत्रिय | क्षत्राणी |
| नौकर | नौकरानी |
Additional Information लिंग दो प्रकार के होते हैं-
- पुल्लिंग
- स्त्रीलिंग
सूची I व सूची II का विशेषण के भेदों के आधार पर मिलान कीजिए एवं नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए
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सूची I |
सूची II |
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A. |
बाज़ार में ताज़ा फल मिल रहे हैं । |
I. |
सार्वनामिक विशेषण |
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B. |
कल मैं दो किलो अंगूर लाया । |
II. |
गुणवाचक विशेषण |
|
C. |
साड़ी थोड़ी छोटी निकल गई । |
III. |
संख्यावाचक विशेषण |
|
D. |
मेरी किताब किसने ली ? |
IV. |
परिमाणवाचक विशेषण |
सही उत्तर है - A - II, B - III, C - IV, D - I
Key Pointsसूची I व सूची II का विशेषण के भेदों के आधार पर मिलान -
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सूची I |
सूची II |
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|
A. |
बाज़ार में ताज़ा फल मिल रहे हैं । |
II. |
गुणवाचक विशेषण |
|
B. |
कल मैं दो किलो अंगूर लाया । |
III. |
संख्यावाचक विशेषण |
|
C. |
साड़ी थोड़ी छोटी निकल गई । |
IV. |
परिमाणवाचक विशेषण |
|
D. |
मेरी किताब किसने ली ? |
I. |
सार्वनामिक विशेषण |
Important Pointsविशेषण के भेद -
- गुणवाचक विशेषण
- परिणामवाचक विशेषण
- संख्यावाचक विशेषण
- सार्वनामिक विशेषण
Additional Information
| विशेषण | परिभाषा | उदाहरण |
| गुणवाचक |
जो शब्द संज्ञा या सर्वनाम के गुण, दोष, दशा, अवस्था, रंग, आकार आदि का बोध कराते हैं, उन्हें गुणवाचक विशेषण कहते हैं। जैसे - अगला, पिछला, लंबा, चौड़ा, गोल. चौकोर, दुबला, पतला, मोटा, लाल, पीला, उचित, अनुचित, पाप, लखनवी आदि। |
मंजू का घर पुराना है। |
| संख्यावाचक | संज्ञा और सर्वनाम शब्दों से प्राणी, व्यक्ति, वस्तु की संख्या की विशेषता का पता चले, उसे संख्यावाचक विशेषण कहते हैं। जैसे- दो, चार, कुछ, हज़ारों, कम, एक, दस, ढाई, सवा, दूसरा, तीसरा, हर, प्रत्येक आदि। |
पाँच विद्यार्थी दौड़ते हैं। |
| परिणामवाचक | जो विशेषण संज्ञा या सर्वनाम की मात्रा या नाप-तौल के परिणाम की विशेषता बताएं उसे परिणामवाचक विशेषण कहते हैं। जैसे- ‘सेर’ भर दूध, ‘तोला’ भर सोना, ‘थोड़ा’ पानी, ‘कुछ’ पानी, ‘सब’ धन, ‘और’ घी लाओ, ‘दो’ लीटर दूध, ‘बहुत’ चीनी इत्यादि। |
मुझे थोड़ा पानी चाहिए। |
| सार्वनामिक |
वे सर्वनाम शब्द संज्ञा के पहले आकर विशेषण का काम करते हैं, उन्हें सार्वनामिक विशेषण कहते हैं। जैसे - मेरी पुस्तक, कोई बालक, किसी का महल, वह लड़का, वह बालक, वह पुस्तक आदि। |
यह लड़का तेज भागता है। |
'कथा' का बहुवचन होगा - 'कथाएँ'
- आकारांत स्त्रीलिंग शब्दों के 'आ' के अंत में 'एँ' बहुवचन बना सकते है,
- 'कथा' आकारांत स्त्रीलिंग एकवचन शब्द है जिसमें 'एँ' लगाकर 'कथाएँ' बहुवचन बनाया जा सकता हैं।
- कथा - बीते हुए जीवन की घटनाओं का क्रम, वर्णन, किस्सा
Key Points
- कथानक - रचना का आदि से अंत तक का सामूहिक रूप, कथा-सार।
Additional Information
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वचन:-
हिन्दी में वचन दो प्रकार के होते हैं-
उदाहरण-
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काली घटा का घमंड घटा। में अलंकार है - यमक
Key Points
- (यहाँ 'घटा' की आवृत्ति दो बार हुई है किन्तु प्रत्येक स्थान पर अर्थों में भिन्नता प्रदर्शित होती है।
- जहाँ पहली बार घटा का अर्थ - काले बादलों से है, वहीं दूसरी बार घटा का अर्थ - कमी होना/हास से सम्बन्धित है।)
- जब एक ही शब्द ज्यादा बार प्रयोग हो, पर हर बार अर्थ अलग-अलग आये वहाँ पर यमक अलंकार होता है।
उदाहरण -
- तीन बेर खाती थी वे तीन बेर खाती हैं।
- (इस पंक्ति में 'बेर' शब्द का दो बार प्रयोग हुआ है।
- पहली बार 'तीन बेर' दिन में तीन बार खाने की तरफ संकेत कर रहा है तथा दूसरी बार 'तीन बेर' का अर्थ है - तीन फल।)
Additional Information
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अन्योक्ति:-
उदाहरण -
अनुप्रास:-
उदाहरण -
उपमा:-
उदाहरण-
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विभाजक समानाधिकरण समुच्चयबोधक अव्यय होगा - अथवा, या, चाहे, नहीं तो
Key Points
- विभाजक वे अव्यय होते हैं, जो दो या अधिक शब्दों या वाक्यों में से किसी एक का अथवा सबका ग्रहण या त्याग करते हैं।
- जैसे- या, न, अथवा, कि, चाहे आदि।
- पढ़ो अथवा सो जाओ।
- चाहे खेलो चाहे न खेलो।
- न मोहन आएगा न सोहन।
अन्य विकल्प -
- परिणामदर्शक - 'अत:, अतएव, इसलिए'
- विरोधदर्शक - 'वरन्, मगर, किन्तु, परन्तु'
- संयोजक - 'तथा, एवं, और'
Important Pointsसमुच्चयबोधक अव्यय:-
- जो शब्द दो शब्दों, वाक्यों और वाक्यांशों को जोड़ते हैं, उन्हें समुच्चयबोधक अव्यय कहते हैं। इन्हें योजक भी कहा जाता है।
- जहाँ पर और, तथा, लेकिन, मगर, व, किन्तु, परन्तु, इसलिए, इस कारण, अत:, क्योंकि, ताकि, या, अथवा, चाहे, यदि, कि, मानो, यानि, तथापि आदि आते हैं।
- जैसे - सूरज निकला और पक्षी बोलने लगे।
- समुच्चयबोधक अव्यय दो प्रकार के होते हैं:
- समानाधिकरण समुच्चयबोधक
- व्यधिकरण समुच्चयबोधक
- समानाधिकरण समुच्चयबोधक चार प्रकार के होते हैं:
- संयोजक
- विभाजक
- विरोधदर्शक
- परिणामदर्शक
Additional Information
| अव्यय | परिभाषा | उदाहरण |
| संयोजक | संयोजक वे अव्यय होते हैं जो दो या अधिक शब्दों या वाक्यों को जोड़ने का कार्य करते हैं। जैसे- और, तथा, व, एवं आदि। | राम और श्याम पढ़ते हैं। |
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विरोधदर्शक |
विरोधदर्शक वे अव्यय होते हैं जो दो वाक्यों में विरोध दिखलाते हुए किसी एक का अर्थग्रहण या निषेध का ज्ञान कराते हैं। जैसे- परंतु, किन्तु, पर, लेकिन, बल्कि, मगर आदि। | तुमने खाना खाया परंतु पानी नहीं पिया। |
| परिणामदर्शक | परिणामदर्शक वे अव्यय होते हैं जिनका प्रयोग पहले वाक्य का परिणाम दूसरे वाक्य में बताने के लिए होता है। जैसे- अतः, इसलिए, इससे, अतएव आदि। | भूख लगी थी इसलिए खाना खाया। |